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शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

भिती चित्रों की रंगभूमी


आजकल में प्रकाशित

राजस्थान के जयपुर में अरावली पर्वत माला की श्रंखला गुजरती है उसके उत्तर के तीन जिलों के क्षेत्र को षेखावाटी कहा जाता है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर षेखावाटी नामक जगह का नामकरण राव षेखा जी के नाम पर हुआ। राव षेखा जी ने षेखावाटी को सन 15 वीं सदी में बसाया था। मेथोलोजी के हिसाब से पंाडवों ने यहां पर वनवास का समय बिताया था और जिस जगह उनकी लोहे की जंजीरें गल गई थी। उस स्थान को ‘लोहार्गल’ कहते है, मगर इतिहास में इनका प्रामाणिक सबूत नहीं मिलता है। वर्तमान समय में जो षेखावाटी का क्षेत्र है उसमें सीकर, चुरु व झुंझुनु नामक तीन जिले षामिल है। इस क्षेत्र की भाषा, रहन सहन व संस्कृति में बाकि राजस्थान से कुछ भिन्न है। यहां की बोली को भी षेखावाटी के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र अपनी कला व संस्कृति के लिए हमेषा अलग पहचान रखता है। 17 वीं षताब्दी में यहां के सेठ साहूकार लोग व्यापार करने के लिए देष के विभिन्न हिस्सों जैसे-कलकत्ता, मुम्बई, व सूरत के अलावा विदेषों में जाकर बस गये। इन्होंने यहां पर बड़ी और सुन्दर हवेलियां बनाई। अगर इन हवेलियों के पीछे के परिदृष्य को देखें कि आखिर इनका निमार्ण क्यों किया गया और वो संसाधन कहां से आये? तब तीन प्रमुख तत्व सामने आते है- एक ब्याज का तांडव, जिसमें 200 से 400 प्रतिषत की दर पर ब्याज लिया जाता था और अनपढ़ किसान व मजदूरों को बूरी तरह लूटा जाता था, उस महाजनी संस्कृति के बीज अभी भी मौजूद है, भाई से लेकर दोस्त तक कोई भी षेखावाटी के इलाके में बिना ब्याज के पांच दिन के लिये भी पैसा उधार नहीं देता और सबसे आष्चर्यजनक बात है कि अभी भी महाजनी समाज में ब्याज दर 24 प्रतिषत है। इस प्रकार एक पूरे ब्याजीय युग के दौरान लूटी गई अपार धन संपदा को इन हवेलियों के निर्माण में दफना दिया गया। दूसरा तत्व है कि विभाजन के समय में दोनों तरफ से ओने जाने वाले शरणार्थियों की सम्पति को लूटा गया और इस लूट में चोरों की एक नई महाजनीय पीढ़ी का जन्म हुआ, वो भी आगे चलकर हवेलियों निमार्ण में आगे आये। तीसरा तत्व है कि आजादी के बाद राजस्थान में भूमी का नाम मात्र का वितरण हुआ है और अभी भी जमीन के बड़े बडे़ जमींदार है जो इन बनीयों से मिलकर किसानों और खेतीहर मजदूरों का शोषण किया और धर्म के नाम पर पंडितों को साथ मिलाकर इन हवेलियों का निर्माण किया।
षेखावाटी अपनी हवेलियों के लिए विष्व प्रसिद्ध है जिसका कारण इन हवेलियों में बनाये गये भिती चित्र है। इस क्षेत्र में रामगढ़, फतेहपुर, लक्ष्मणगढ़, मंडावा, महनसर , बिसाऊ, नवलगढ़, डूडलोद व मुकंदगढ़ जैसे कस्बे हवेलियों के कारण ही आज भी विष्व सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र बने हुए है। इन हवेलियों के गुम्बद से लेकर तलघर तक भिती चित्रों से अटे पड़े है। विष्व में भिती चित्रों पर षोध करने वाले अनेक षोधार्थी हर साल यहां आते है। षेखावाटी को खुली कला दीर्घा भी कहा जाता है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय यहां पर भी छोटे मोटे स्तर पर किसान विद्रोह हुए थे मगर वे अंग्रेजी हुकुमत के विरोध में न होकर सामंतों के विरोध में थे अतः बड़े फलक के रुप में नहीं उभर सके। वर्तमान समय में इन हवेलियों के भिती चित्रों को देखने से पता चलता है कि इस चित्रकारी पर अलग-अलग युग का असर रहा है। कहीं मुगलकालीन दरबार व चित्रषैली देखने को मिलती है तो कहीं पारसी षैली का भी प्रभाव है।

महनसर के सेठ सेजाराम पोद्दार की हवेली की सोने चांदी की दुकाने, पोद्दारों की छत्तरियां और यहां के गढ़ काफी मषहूर है। ष्षेखावाटी में रजवाड़ों के समय अनेक देषी राजाओं ने अपने गढ़ बनाये जो किसी पहाड़ या ऊँचे टीले पर स्थित है। इन गढ़ों में सीकर, लक्ष्मणगढ़, डूण्डलोदेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेे, बठोठ व पाटोदा के गढ़ प्रमुख हैेें । इन गढ़ों पर चित्रकारी का सुन्दर आंकलन देखा जा सकता हैैैैैै। डूंडलोद का गढ़ तो आजकाल हैरिटेज होटल बन गया है। लक्ष्मणगढ़ व कुछ अन्य गढ़ो को पूंजीपतियों ने खरीद लिया है जिसके कारण आज जनता इस कला व संस्कृति को देखने से वंचित है। डूंडलोद की गोयनिका हवेली खुर्रेदार हवेली के नाम स प्रसिद्ध है। इस हवेली का निमार्ण सेठ अर्जुनदास गोयनका ने करवाया था । इस विषालकाय चैक की हवेली क बाहर दो बैठकें आकर्षक द्वार और भीतर सोलह कक्षों का निमार्ण किया गया है। जिनके भीतर कोठरियों, दुछत्तियों, खूंटियों, कड़ियों आदि की पर्याप्त व्यवस्था रखी गई है। इसे आजकल संग्राहलय का दर्जा दे दिया गया है। इस घुमावदार खुर्दे की हवेली का भीतरी हिस्सा लोक चित्रों से भरा हुआ है, जिसमें कृष्ण लीला के चित्र प्रमुख है। मन्डावा के कासन होटल, सागरमल लदिया की हवेली, रामदेव चैखानी की हवेली व मोहनलाल नेवटिया की हवेली भी दर्षनीय है। झुंझुनु में रानी सती का मंदिर, टीबड़े वालो की हवेली और ईसरदास मोदी की सैकड़ों खिड़कियों की हवेली है। रामगढ़ षेखावाटी में रामगोपाल पोद्दार की छतरी में रामकथा अपने लोककला के साथ चित्रित है। इसके अलावा रामगढ़ में खेमका हवेली भी है। यह वही रामगढ़ है जहां लक्ष्मीनिवास मित्तल के पूर्वज रहते थे। चुरु में मालखी का कमरा, सुराणों का हवामहल, रामविलास गोयनका की हवेली,मंत्रियों की बड़ी हवेली औेेर कन्हैयालाल बागला की हवेली दर्षनीय है। इसके अलावा नवलगढ़ में भी बहुत सी हवेलियां हैं जहां पर ‘पहेली’ जैसी अनेक फिल्मों की सूटिंग होती है।
इन हवेलियों में प्राकृतिक रंगों से भिती चित्रों का जो चित्रांकन किया गया है वो अदभुत है। इतिहास के हर युग की कला व षैली का प्रभाव इन चित्रों पर नजर आता है। एक तरफ पौराणिक कथाओं का चित्रांकन लोक कला में उकेरा है वहीं दूसरी तरफ अकबर के चित्र साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेष देते है।
ये हवेलिया तो जिंदा है मगर आजादी के 61 साल बाद आज स्थिति यह है कि इन हवेलियों के भिती चित्रों को बनाने वाले कलाकारों की पूरी पीढ़ी ही लुफ्त हो गई है। एक भी चित्रकार नहीं रहा जो भिती चित्रों की इस दुनियां को जानता हो। इसके अनेक कारण गिनाये जा सकतें हैं कि आजादी के बाद न तो सरकार इन चित्रकारों की तरफ कोई ध्यान दिया और न ही समाज अपने स्तर पर इनकी कला को आगे बढ़ा सका। सबसे बड़ा सवाल है कि उस शोषण के इतिहास को पूरी तरह मिटाकर, बनीयों के बाप दादाओं के नाम पर कसीदे पढ़े जाते है।

-संदीप कुमार मील/ मोबाइल नम्बर- 8800780131

3 टिप्‍पणियां:

ललित शर्मा ने कहा…

चोखी जानकारी है।

राम राम

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

आपके हवाले से हवेलियों का अनूठा इतिहास जाना, आभार।

Swarajya karun ने कहा…

'हवेलियाँ ज़िंदा हैं, उनकी दीवारों पर सुंदर भित्ति-चित्र ज़िंदा हैं, लेकिन उन्हें बनाने वाले कलाकारों की पूरी पीढ़ी ही लुप्त हो गयी है' आपका यह दर्द वाकई हर किसी को महसूस करना चाहिए,लेकिन सिर्फ ये कलाकार ही क्यों, इन हवेलियों को बनाने वाले मेहनतकश मजदूरों और कारीगरों की भी तो कई पीढियां विलुप्त हो गयी हैं. कोई नहीं जानता कि इन भव्य महलों के निर्माण में कितने हज़ारों-लाखों लोगों का खून-पसीना एक हुआ है लेकिन इनमे रह चुके चंद बड़े लोगों के नाम ज़रूर हमे याद हैं. यही तो विडम्बना है. एक संवेदनशील विषय पर संवेदनाओं से परिपूर्ण इस आलेख के लिए आभार. वसंत-पंचमी की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं.