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शनिवार, 31 जनवरी 2009

मेरी माँ

मेरी माँ
अलग है थोडी
दुनियाँ से
काला रंग
मिटी से सना शरीर
सर पर
गोबर
बिखरे बाल
पसीने से लर बतर
चहरे पर झुरिया
फटे कपड़े
वात्सल्य का सुखा समंदर
हाथों में छाले
पहले
अपने बाप के लिये
बाद में
मेरे बाप के लिये
अब
मेरे लिये
ढिबरी लिये
खोजती रही
चंद रोटी के टुकड़े
दौलत की गलियों से
झांक कर देखो
करोड़ों मांए है
शायद मेरी भी
उन में एक हो




1 टिप्पणी:

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

अच्छी कविता कहना सिर्फ औपचारिकता होगा।
माँ को लेकर तमाम भावुक कवितायें लिखी जाती हैं - उसे उसकी पूरी मानवीय गरिमा और रंग ,गंध के साथ महसूसने की कोशिश बहुत कम हुई है।
यह कविता उस ज़रूरत की ओर बढा हुआ कदम है।
बधाई
asuvidha.blogspot.com