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शुक्रवार, 1 मार्च 2013

आत्महत्या नहीं संघर्ष

नवउदारवादी दौर में लगातार भारतीय कृषि पर मंडरा रहे संकटों के कारण एक ओर जहां किसान आत्महत्याएं लगातार बढ़ रही हैं। किसान लगातार खेती छोड़कर आजीविका के अन्य साधनों की ओर रुख कर रहे हैं और खेती की जमीन उद्योगों के हवाले की जा रही। वहीं पर एक किसान आंदोलन ने सफलता का एक चरण पूरा कर लिया। संघर्षों के सफर में अक्सर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इसने आत्महत्याओं और निराशा के माहौल को तोड़कर आशा और उम्मीदों की सुबह की ओर कदम बढ़ाया है। राजस्थान के चुरू जिले के किसानों ने तैयालीस दिनों के आंदोलन के उपरांत 228 करोड़ रुपये का फसल बीमा प्राप्त करने में सफलता अर्जित की। शायद यह भारत के किसान आंदोलन का पहला उदाहरण है जहां पर किसानों ने लम्बे संघर्ष के बाद इतनी बड़ी राशी में फसल बीमा पाने में सफल रहे हैं। दरअसल चुरु जिले में पाले से चने व सरसों की फसल नष्ट हो गई थी। छोटी जोतों के किसानों की फसल पूर्ण रूप से पाला प्रभावित होने के कारण पूरे क्षेत्र में एक निराशा छा गई। किसानों एग्रीकल्चर इंशोरेंस कम्पनी के माध्यम से फसल बीमा करवा रखी थी। यह बीमा कापरेटिव सोसायटी व अन्य बैंकों के माध्यम से करवा रखी थी। बीमा करवाने से वाले अधिकांशतः छोटे किसान थे और कापरेटिव सोसायटी के माध्यम से जिन्होंने बीमा करवायी थी वे तो ज्यादातर दलित पृष्टभूमि के किसान थे। फसल नष्ट होने पर समय पर किसानों का बीमा राशी नहीं दी जा रही थी। तारानगर, राजगढ़, सरदारशहर के किसानों ने मिलकर किसान सभा के नेतृत्व में आंदोलन शुरु कर दिया। आंदोलन का पहला चरण 22 मई से शुरु और और फिर 13 जुलाई को तारानगर तहसील के किसानों ने बाजार बंद करवाया और 26 जुलाई को उन्होंने तहसील कार्यालय पर छब्बीस घंटे तक कब्जा रखा। इससे किसानों का उत्साह बड़ा और सैंकड़ों की तादात में अन्य किसान भी उनसे जुड़ गये। सिर्फ तहसील कार्यालय के अतिरिक्त भी क्षेत्र के गांवों में अनेक जगह पर धरने, प्रदर्शन और रैलियों की कड़ी शुरू हो गई। 
यह अपने अधिकारों के प्रगति किसानों की जागृति का अनुपम उदाहरण साबित हुआ और आंदोलन की गति तेज होती गई। प्रथम चरण में किसानों को पूरी बीमा राशी नहीं दी गई। इसमें कुल 22 करोड़ की राशी दी गई और प्रशासन का कहना था कि जिनका एक जगह बीमा किया गया उन्हीं को मुआवजा दिया जायेगा। जन विरोधी नीतियों का विरोध करने वाले किसानों ने ठान ली कि वे अपना पूरा हक लेकर रहेंगे। इस दौरान लोग अपने जाति, धर्म और अन्य भेदभावों को त्यागकर लामबंध हुए और एक अहिंसक आंदोलन को आगे बढ़ाया। यहां सवाल सिर्फ फसल बीमा का ही नहीं था, किसान बिजली की दरों में वृद्धि, फसलों के उचित मूल्य न मिलना, कृषि के लिए दी जाने वाली सब्सीडी घटाने के नीतियों से त्रस्त किसानों के गुस्से का एक रूप था। लगातार ऐसी नीतियों के कारण कर्ज में डूबा किसान इस बार आत्महत्या का रास्ता अख्तियार करने की बजाय संघर्ष की राह चुनी। यही मूल वजह उनमें राजनीतिक चेतना के संचार की रही है क्योंकि वे यह समझ गये थे उनकी दुदर्शा का कारण नई आर्थिक नीतियां हैं और आत्महत्या उनका समाधान नहीं है।
दूसरे चरण के आंदोलन की शुरुआत हुई और इस बार प्रथम चरण से ज्यादा जोश व आक्रोश के साथ लोगों ने धरने-प्रदर्शन में भागीदारी दर्ज कराई। आंदोलन का एक पक्ष बहुत मजबूत था कि इसमें छात्र, महिलाओं सहित एक बड़े तबके ने एक साथ उपस्थिति दर्ज कराई। इस चरण के दौरान बची हुई बीमा राशी भी कम्पनी को देनी पड़ी और अकेले तारानगर तहसील के किसानों को 94 करोड़ रुपये का मुआवजा मिला। कुल 228 करोड़ के मुआवजे में 218 करोड़ तो केवल चने की फसल का मुआवजा था और उसमें से भी 33 करोड़ कापरेटिव सोसायटी को मिला। यह एक तरह से किसानों में सामूहिकता के प्रति विश्वास को बढ़ावा दिया है। इस फसल बीमा के दौरान किसानों ने पचास रुपये प्रति बिघा की दर से बीमा कराई और शेष राशी में से पच्चीस प्रतिशत राज्य सरकार व बाकि की केंद्र सरकार की ओर से जमा कराई जाती है। और किसानों को मिलने वाली बीमा राशी पंद्रह सौ रुपये प्रति बिघा यानी की एक हैक्टेयर के लिए छह हजार रुपये का अनुदान मिला। चुंकि इस राशी से फसल के मूल्य की भरपाई तो नहीं हो सकती लेकिन आत्महत्या की तरफ जाने वाले किसान को राहत भी मिल गई और रास्ता भी।
शायद भारत के कर्ज में डूबे किसानों के लिए यह आंदोलन एक संदेश का कार्य कर सकता है और उनमें ऊर्जा का संचार करके जिंदगी की राह पर संघर्ष का रास्ता दिया सकता है।

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

फैक्टरियों के लिए उजाड़े हजारों बीघे हरे -भरे खेत

झुंझुनू के लगभग 16 गांवों यानी 6 पंचायतों को उजाड़कर तीन व्यावसायिक परिवारों के हित देखनेवाली व्यवस्था को कम से कम लोकतंत्र तो नहीं कह सकते। इसी जिले को सरकार ने डार्क जोन घोषित किया है यानी कोई भी किसान अपने खेत में कुआं नहीं खोद सकता। वहीं उसी जिले में सरकार ने एक कम्पनी को 40 हजार घन लीटर पानी देने का करार किया है। मतलब सरकार के पास किसानों के लिए पानी नहीं है और पूंजीपतियों की लिए सब कुछ

राजस्थान के झुंझुनू जिले में, तीन सीमेंट फैक्टरी लगाने के लिये सरकार किसानों की 70 हजार बीघा जमीन किसानों से छीनकर पूंजीपतियों के हवाले कर रही है। अधिग्रहण के तहत आ रही जमीन राजस्थान की सबसे उपजाऊ जमीनों में से है। जिसके अधिग्रहण से करीब 50 हजार लोग बेघर हो जाएंगे। श्री सीमेंट ने भूमि अधिग्रहण के लिए 1280 बीघा के चेक अगस्त में बनाकर जमीन मालिकों को बांटना शुरू किया लेकिन लोगों ने चेक लेने से मना कर दिया। उनके कुछ सवाल थे- कीमत किससे पूछ कर तय की गई? जमीन से बेदखल होकर वे लोग अब कहां जाएं? लगभग 16 गांवों यानी 6 पंचायतों को उजाड़कर तीन व्यावसायिक परिवारों के हित देखनेवाली व्यवस्था को कम से कम लोकतंत्र तो नहीं कह सकते। श्री सीमेंट द्वारा चेक भेजने से पहले 50 बीघा जमीन बिचौलियों द्वारा खरीद ली गई थी और बाद में वे ही लोग चेक ले लिए बाकी लोगों ने चेक लेने से मना कर दिया और धरने पर बैठ गए। यह आंदोलन की शुरुआत थी जो धीरे-धीरे एक व्यवस्थित आंदोलन का रूप ले लिया। विधानसभा चुनावों से पहले तमाम नेता आकर वादा किए कि वह खुद मर जायेंगे मगर किसानों की जमीन नहीं जाने देंगे लेकिन जो चुनाव जीत गये वह सत्ता सुख में लिप्त हो गये। जो हार गए, वह अपने व्यवसाय में लग गए। किसानों की सुध लेने वाला कोई नहीं रहा। वैसे भी किसान सत्ता के चरित्र से वाकिफ थे। इसलिए उन्होंने आंदोलन चलाने के लिए किसान संघर्ष समिति का गठन किया जो आंदोलन के आगे की रणनीति तय करे। इस भूमि अधिग्रहण से प्रभावित होने वाली पंचायतों के सरपंचों से लेकर 99 प्रतिशत लोग सरकार की इस जनविरोधी नीति का विरोध कर रहे हैं। किसानों का एक तर्क बहुत मजबूत है कि आप यहां खनन करें लेकिन उत्पादन कारखाना किसी बंजर भूमि पर लगवा दो। किसानों के धरने- प्रदर्शन लगातार जारी हैं लेकिन प्रशासन लोगों को डराध मकाकर उनकी जमीन हड़पना चाहता है। इन कम्पनियों ने नए-नए तरीके अपनाकर आंदोलन को बिखेरने की कोशिश भी की है। हरेक जाति के कुछ लोगों को लालच देकर जातिगत बिखराव करके आंदोलन तोड़ने का कुचक्र भी रचा गया है। मगर सवाल लोगों की रोजी-रोटी का है। अत: कम्पनियों के मंसूबे सफल नहीं हो पा रहे हैं। इस आंदोलन से साफ है कि राजस्थान भी कोई शांत राज्य नहीं है, घड़साना अब भी उबल रहा है, जो कभी आंदोलन का रूप ले सकता है। आश्र्चय यह है कि इसी झुंझुनू जिले को सरकार ने डार्क जोन घोषित किया है यानी कोई भी किसान अपने खेत में कुआं नहीं खोद सकता वहीं उसी जिले में सरकार ने एक कम्पनी को 40 हजार घन लीटर पानी देने का करार किया है। मतलब सरकार के पास किसानों के लिए पानी नहीं है और पूंजीपतियों की लिए सब कुछ। यह भी ध्यान देने की बात है कि स्थानीय मीडिया इस आंदोलन के प्रति किसी प्रकार की दिलचस्पी नहीं दिखाई है। किसान सभा और अन्य संगठन इस आंदोलन में पूरी तरह से लगे हुए हैं लेकिन अन्य कोई दल आगे नहीं आ रहा है। सवाल सिर्फ झुंझुनू या घड़साना का नहीं है। पूरे देश में चल रहे उन जन आंदोलनों का है जो छोटे-छोटे रूपों में हैं लेकिन उनसे एक आशा की किरण मिलती है जो व्यवस्था को बदलने की कूवत रखते हैं। राजस्थान में जिस तरह से सामंतवाद रहा है और आज की जो स्थिति है, उसे देखकर लगता है कि एक व्यापक जन आंदोलन दस्तक दे रहा है।
12/03/11 के राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित

http://rashtriyasahara.samaylive.com/epapermain.aspx?queryed=17

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

शोषण कि मंडी

सूत्रों से पता चला है कि कुछ मीडिया संस्थानों में मोहल्ला, जनतंत्र और भड़ास ४ मीडिया जैसी सामाजिक एवं पत्रकारिता से जुडी साइटों को खोलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. अब सवाल उठता है कि इन साइटों पर ऐसा क्या है जिसके कारण मीडिया संस्थानों को दिक्कत होती है. असल में मीडिया संस्थानों द्वारा लीक से हटकर काम करने वाले तमाम लोगों से दिक्कत होती है. मोहल्ला,जनतंत्र और भड़ास ४ मीडिया पढने वाले तो उसे कहीं और भी पढ़ सकते हैं मगर इससे भारतीय मीडिया का चरित्र साफ़ हो जाता है. इसी तरह से और भी परिवर्तन मीडिया संस्थानों में हो रहे हैं, जिसे सुन कर आप भौचक्के रह जायेंगे. अगर आप किसी मीडिया संसथान में नौकरी कर रहे हैं तो वहां पर कोई भी सोशल नेटवर्किंग साईट नहीं खोल सकते क्योंकि इससे आप समाज से जुड़ जाते हैं.और पारंपरिक मीडिया पत्रकारों को समाज से जुड़ने कि बजाये समाज से दूर करने कि मान्यता पर आधारित है, मतलब ये कि संस्थानों में काम करने के दौरान आप समाज से किसी तरह से जुड़ने का प्रयास न करें और पत्रकार बंधू किसी तरह से भी संचारक्रांति के करीब न आयें. इसमें सबसे मज़ेदार बात ये है कि इस पूरी मुहीम में वो लोग भी शामिल हैं जो पत्रकारों के हितों में लम्बी लम्बी बात करते हैं. ऐसी स्थिति में सुध लेने वालों कि सुध कौन लेगा, दुनियाभर के मानवधिकारों कि बात करने वाला पत्रकार समुदाय आज अपने ही मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ आवाज़ नहीं उठा पाते हैं. मीडिया संस्थान एक पत्रकार को इंसान की बजाय मशीन मानते हैं, कुछ संस्थानों में पत्रकारों का आर्थिक और शारीरिक शोषण लगातार जारी है. महीनो तक तनख्वाह नहीं मिलती और अगर आप आवाज़ उठायें तो नौकरी छोड़ने के लिए तैयार हो जाएँ.चौकाने वाला तथ्य यह है कि छोटे और बड़े मीडिया संस्थानों में पंद्रह सौ रुपये के मासिक पर पत्रकारों से दस से बारह घंटे काम कराया जाता है.
अब सचेत हो जाइये, कल ऑफिस में भी नोटिस लग सकता है -
नोटिस
(आज से कार्यालय में निम्नाकित नियम लागू है)
1 . मोहल्ला, जनतंत्र और भड़ास ४ मीडिया जैसी साइट खोलना प्रतिबंधित है.
2 . फेसबुक, जीमेल और ऑरकुट खोलना मना है.
3 . मोबाईल ऑन रखना प्रतिबंधित है.
4 . ऑफिस समय में पेशाब करना मना है.
5 . ऑफिस में हंसना मना है ( आप यहाँ रो भी नहीं सकते)
6 . ऑफिस के काम के अलावा एक दूसरे से बात करना प्रतिबंधित है.
7 . ऑफिस में खांसना मना है (भले ही आपको जुखाम हो)
8 . ऑफिस में दाढ़ी रखना भी मना है.
(उपरोक्त नियमों का उलंघन करनेवालों के खिलाफ कड़ा कदम उठाया जायेगा.)
आज्ञा से
(शोषण मीडिया केंद्र)

सनोबर विला में एक अजनबी

समकालीन भारतीय साहित्य के 151 नंबर के अंक में प्रकाशित
इस कहानी संग्रह में ओम गोस्वामी की पांच कहानियां है जो विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में बहुत पहले प्रकाषित हो चुकी है। ‘इस बीच’ नामक कहानी पर तो धारावाहिक भी बन चुका है। कथाकार ने जीवन के खट्टे मिट्ठे अनुभवों को जिस प्रकार से शब्दों के ताने बाने में बुना है वो साहित्य और समाज के लिये एक शुभ संकेत है। इस संग्रह की हर कहानी अलग- अलग विषय वस्तु लिये हुये है।
पहली कहानी ‘सनोबर विला में एक अजनबी’ में ‘गुरटू’ नामक नौकर का चरित्र उस भारतीय समाज का नेतृत्व कर रहा है जो गरीब रहते हुए भी अपने सिद्धान्त से समझौता नहीं करता है। ‘गुरटू’ के पूरे परिवार को आतंकवादियों ने मार डाला था, वह किसी तरह बच निकला था। गुरटू एक विख्यात विद्वान तो था ही साथ ही खाना बनाने का लाजवाब हूनर भी रखता था। इसी हुनर से वह अपनी प्रतिभा को दबा कर भी सेठ कुंजनलाल के धर पर नौकरी कर जीवन गुजार रहा था। गुरटू एक ऐसा चरित्र है जिसमें जीवन के प्रति अदम्य जीजिविषा कूट - कूट कर भरी हई है। वो अपनी कला व मेहनत से इज्जत की जीन्दगी जीना चाहता है।
दूसरी तरफ सेठ कुंजनलाल, लखीराम व करोड़ीमल उस सामाजिक मानसिकता को प्रदर्षित करते है जो अपने तुच्छ स्वार्थों के लिये इंसानियत की भी बली देकर आदमी की खरीद फरोख्त करती है। इन्हें पैसों का इतना धमण्ड होता है कि हर चीज को पैसे के तराजु में तोलतें है, जहां पर इंसानियत व मानवीय भावनाओं के लिये कोई स्थान नहीं होता है। कहानी का भावप्रवाह शब्दों के माध्यम से कसावट लिये हुए है। सरदार जी का पूरा व्यक्तित्व इस तरह का है कि वह प्रतिभा को आदर व सम्मान देना जानता है। बुढ़े बुजुर्ग की इज्जत करने का संस्कार होने के कारण ही वह गुरटू को ससम्मान अपने साथ ले जाता है। पूरी कहानी में सामाजिक द्वंद को दर्षाया है जिसमें मानवीय व्यवहार के अच्छे और बूरे दोनों पहलूओं की जानकारी मिलती है।
दूसरी कहानी ‘जीवन युद्ध’ एक ऐसे व्यक्तित्व मास्टर राँझूराम के जीवन की कहानी है जिसकी जिंदगी में रिष्तों कोई अहमीयत नहीं है। सिर्फ पैसे के बल पर समाज में खुद को श्रेष्ठ दिखानें की चाह रखता है। बाप और बेटे के रिष्ते के प्रेम की डोरी में बांधे रखने में उसका विष्वास नहीं है। इसी कारण राँझूराम के जीवन युद्ध में प्रतिपक्ष कोई दूसरा न होकर उसका बेटा ही हुआ।पांच बेटों का पिता होते हुए भी रिष्तों की अहमियत नहीं समझ पाया और शायद यही कारण हुआ कि अंत में उसके बेटे भी बाप को दौलत की मषीन मानने लगे। रँझूराम की पत्नि शालिन और भोलीभाली औरत जो सबकुछ जानते हुए भी मूकदर्षक बनी रहती है।यह पूरी कहानी वर्तमान परिपेक्ष्य की साक्षी है कि दौलत की इस अंधाधुध दौड़ में रिष्ते पिछे छूट जातें हैं। जब तक आदमी को इस बात का अहसास होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
इस संग्रह की हर कहानी किसी न किसी सामाजिक बुराई पर चोट मार्मिक पहुंचा रहीं हैं। ‘दर्द की दहलीज’ काहनर की नायिका नौजी एक पतिवर्ता, षीलवति और भारतीय नारी का संकेत देती है, जो हर कष्ट सहते हुए भी अपनी अस्मिता को बचाना चाहती है। एक विधवा औरत को समाज में जिन नाना प्रकार के दुः खों का सामना करना पड़ता है, उसका दर्द भरा चित्रण साहित्य सीमाओं में रहते हुए इस कहानी में किया गया है।
पंडित अमिचंद नषे का हद से ज्यादा षिकार होने के कारण नैतिकता अनैतिकता के पैमाने भूल चुका था। चैधरी जैसे लोग पुरुष प्रधान समाज के वो अनैतिक तत्व है जो स्त्रि को केवल भोग की वस्तु समझते हैं। इस कहानी का जिस प्रकार से अंत होता है, वह कि एक औरत का दुःख केवल औरत ही समझ सकती है क्यांकि वो ही पुरुषप्रधान समाज के काँटों को भोगती है। यह कहानी दुनियंा के उन तमाम समाजों का दर्पण है, जहां पर लिंग के आधार शोषण होता है। चाहे वो पत्नि के रुप में हो या फिर स्त्रि होने के नाते शारीरिक और मानसिक यातना हो।

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

भिती चित्रों की रंगभूमी


आजकल में प्रकाशित

राजस्थान के जयपुर में अरावली पर्वत माला की श्रंखला गुजरती है उसके उत्तर के तीन जिलों के क्षेत्र को षेखावाटी कहा जाता है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर षेखावाटी नामक जगह का नामकरण राव षेखा जी के नाम पर हुआ। राव षेखा जी ने षेखावाटी को सन 15 वीं सदी में बसाया था। मेथोलोजी के हिसाब से पंाडवों ने यहां पर वनवास का समय बिताया था और जिस जगह उनकी लोहे की जंजीरें गल गई थी। उस स्थान को ‘लोहार्गल’ कहते है, मगर इतिहास में इनका प्रामाणिक सबूत नहीं मिलता है। वर्तमान समय में जो षेखावाटी का क्षेत्र है उसमें सीकर, चुरु व झुंझुनु नामक तीन जिले षामिल है। इस क्षेत्र की भाषा, रहन सहन व संस्कृति में बाकि राजस्थान से कुछ भिन्न है। यहां की बोली को भी षेखावाटी के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र अपनी कला व संस्कृति के लिए हमेषा अलग पहचान रखता है। 17 वीं षताब्दी में यहां के सेठ साहूकार लोग व्यापार करने के लिए देष के विभिन्न हिस्सों जैसे-कलकत्ता, मुम्बई, व सूरत के अलावा विदेषों में जाकर बस गये। इन्होंने यहां पर बड़ी और सुन्दर हवेलियां बनाई। अगर इन हवेलियों के पीछे के परिदृष्य को देखें कि आखिर इनका निमार्ण क्यों किया गया और वो संसाधन कहां से आये? तब तीन प्रमुख तत्व सामने आते है- एक ब्याज का तांडव, जिसमें 200 से 400 प्रतिषत की दर पर ब्याज लिया जाता था और अनपढ़ किसान व मजदूरों को बूरी तरह लूटा जाता था, उस महाजनी संस्कृति के बीज अभी भी मौजूद है, भाई से लेकर दोस्त तक कोई भी षेखावाटी के इलाके में बिना ब्याज के पांच दिन के लिये भी पैसा उधार नहीं देता और सबसे आष्चर्यजनक बात है कि अभी भी महाजनी समाज में ब्याज दर 24 प्रतिषत है। इस प्रकार एक पूरे ब्याजीय युग के दौरान लूटी गई अपार धन संपदा को इन हवेलियों के निर्माण में दफना दिया गया। दूसरा तत्व है कि विभाजन के समय में दोनों तरफ से ओने जाने वाले शरणार्थियों की सम्पति को लूटा गया और इस लूट में चोरों की एक नई महाजनीय पीढ़ी का जन्म हुआ, वो भी आगे चलकर हवेलियों निमार्ण में आगे आये। तीसरा तत्व है कि आजादी के बाद राजस्थान में भूमी का नाम मात्र का वितरण हुआ है और अभी भी जमीन के बड़े बडे़ जमींदार है जो इन बनीयों से मिलकर किसानों और खेतीहर मजदूरों का शोषण किया और धर्म के नाम पर पंडितों को साथ मिलाकर इन हवेलियों का निर्माण किया।
षेखावाटी अपनी हवेलियों के लिए विष्व प्रसिद्ध है जिसका कारण इन हवेलियों में बनाये गये भिती चित्र है। इस क्षेत्र में रामगढ़, फतेहपुर, लक्ष्मणगढ़, मंडावा, महनसर , बिसाऊ, नवलगढ़, डूडलोद व मुकंदगढ़ जैसे कस्बे हवेलियों के कारण ही आज भी विष्व सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र बने हुए है। इन हवेलियों के गुम्बद से लेकर तलघर तक भिती चित्रों से अटे पड़े है। विष्व में भिती चित्रों पर षोध करने वाले अनेक षोधार्थी हर साल यहां आते है। षेखावाटी को खुली कला दीर्घा भी कहा जाता है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय यहां पर भी छोटे मोटे स्तर पर किसान विद्रोह हुए थे मगर वे अंग्रेजी हुकुमत के विरोध में न होकर सामंतों के विरोध में थे अतः बड़े फलक के रुप में नहीं उभर सके। वर्तमान समय में इन हवेलियों के भिती चित्रों को देखने से पता चलता है कि इस चित्रकारी पर अलग-अलग युग का असर रहा है। कहीं मुगलकालीन दरबार व चित्रषैली देखने को मिलती है तो कहीं पारसी षैली का भी प्रभाव है।

महनसर के सेठ सेजाराम पोद्दार की हवेली की सोने चांदी की दुकाने, पोद्दारों की छत्तरियां और यहां के गढ़ काफी मषहूर है। ष्षेखावाटी में रजवाड़ों के समय अनेक देषी राजाओं ने अपने गढ़ बनाये जो किसी पहाड़ या ऊँचे टीले पर स्थित है। इन गढ़ों में सीकर, लक्ष्मणगढ़, डूण्डलोदेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेे, बठोठ व पाटोदा के गढ़ प्रमुख हैेें । इन गढ़ों पर चित्रकारी का सुन्दर आंकलन देखा जा सकता हैैैैैै। डूंडलोद का गढ़ तो आजकाल हैरिटेज होटल बन गया है। लक्ष्मणगढ़ व कुछ अन्य गढ़ो को पूंजीपतियों ने खरीद लिया है जिसके कारण आज जनता इस कला व संस्कृति को देखने से वंचित है। डूंडलोद की गोयनिका हवेली खुर्रेदार हवेली के नाम स प्रसिद्ध है। इस हवेली का निमार्ण सेठ अर्जुनदास गोयनका ने करवाया था । इस विषालकाय चैक की हवेली क बाहर दो बैठकें आकर्षक द्वार और भीतर सोलह कक्षों का निमार्ण किया गया है। जिनके भीतर कोठरियों, दुछत्तियों, खूंटियों, कड़ियों आदि की पर्याप्त व्यवस्था रखी गई है। इसे आजकल संग्राहलय का दर्जा दे दिया गया है। इस घुमावदार खुर्दे की हवेली का भीतरी हिस्सा लोक चित्रों से भरा हुआ है, जिसमें कृष्ण लीला के चित्र प्रमुख है। मन्डावा के कासन होटल, सागरमल लदिया की हवेली, रामदेव चैखानी की हवेली व मोहनलाल नेवटिया की हवेली भी दर्षनीय है। झुंझुनु में रानी सती का मंदिर, टीबड़े वालो की हवेली और ईसरदास मोदी की सैकड़ों खिड़कियों की हवेली है। रामगढ़ षेखावाटी में रामगोपाल पोद्दार की छतरी में रामकथा अपने लोककला के साथ चित्रित है। इसके अलावा रामगढ़ में खेमका हवेली भी है। यह वही रामगढ़ है जहां लक्ष्मीनिवास मित्तल के पूर्वज रहते थे। चुरु में मालखी का कमरा, सुराणों का हवामहल, रामविलास गोयनका की हवेली,मंत्रियों की बड़ी हवेली औेेर कन्हैयालाल बागला की हवेली दर्षनीय है। इसके अलावा नवलगढ़ में भी बहुत सी हवेलियां हैं जहां पर ‘पहेली’ जैसी अनेक फिल्मों की सूटिंग होती है।
इन हवेलियों में प्राकृतिक रंगों से भिती चित्रों का जो चित्रांकन किया गया है वो अदभुत है। इतिहास के हर युग की कला व षैली का प्रभाव इन चित्रों पर नजर आता है। एक तरफ पौराणिक कथाओं का चित्रांकन लोक कला में उकेरा है वहीं दूसरी तरफ अकबर के चित्र साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेष देते है।
ये हवेलिया तो जिंदा है मगर आजादी के 61 साल बाद आज स्थिति यह है कि इन हवेलियों के भिती चित्रों को बनाने वाले कलाकारों की पूरी पीढ़ी ही लुफ्त हो गई है। एक भी चित्रकार नहीं रहा जो भिती चित्रों की इस दुनियां को जानता हो। इसके अनेक कारण गिनाये जा सकतें हैं कि आजादी के बाद न तो सरकार इन चित्रकारों की तरफ कोई ध्यान दिया और न ही समाज अपने स्तर पर इनकी कला को आगे बढ़ा सका। सबसे बड़ा सवाल है कि उस शोषण के इतिहास को पूरी तरह मिटाकर, बनीयों के बाप दादाओं के नाम पर कसीदे पढ़े जाते है।

-संदीप कुमार मील/ मोबाइल नम्बर- 8800780131

रविवार, 30 जनवरी 2011

दलितों की औधोगिक दख़ल

आज से लगभग पांच साल पहले फिक्की की तर्ज पर मिलिंद कांबले ने डिक्की (दलित इंडियन चैंबर आॅफ कॅामर्स) की स्थापना की, तब यह एक शुरूआती कदम था लेकिन अब डिक्की का सालाना टर्न आॅवर पांच हजार करोड़ रूपये तक पहुँच गया है। पिछले दिनों इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में दलित करोड़पतियों का इक्कठा होना भारतीय पूंजीवादी इतिहास में नया कदम है। पचास से पांच सौ करोड़ सालाना टर्न अॅावर वाले दलित उधोगपतियों ने नये साल के लक्ष्य तय किये कि वो 2011 में हेलिकाॅप्टर खरीदेंगे। अब सवाल उठता है कि पूंजीवाद के मूलभूत दुर्गुणों से क्या यह नया पूंजीपति वर्ग बच पायेगा ? हालांकि इन सब उधोगपतियों ने शून्य से व्यापार शुरू किया है और एक स्टेज पर जाकर भारतीय उधोग जगत में अपना स्थान बनाया है। लेकिन पूंजीवाद की गिरफ्त में आने के बाद वे अपने समाज के बारे में कितना सोच पाते हैं, क्योंकि पूंजीवाद का धरातल शोषण पर टिका हुआ है और जब आर्थिक शोषण की बात आती है तो जाति गौण हो जाती है। सामाजिक समानता की बात करते समय आर्थिक शोषण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, एक ही समाज द्वारा अपने सदस्यों का आर्थिक शोषण भारतीय समाज में कोई नई बात नहीं है। भारत में वर्ग संघर्ष और वर्ण संघर्ष दोनों समानांतर है।
इस नये पूंजीपति वर्ग के उभरने से जो सकारात्मक पक्ष उभरेगा वो होगा कि औधोगिक क्षेत्र में सवर्ण वर्चस्व को धक्का लगना। समाज के हर पिछडे़ वर्ग में एक आत्मविश्वास की किरण फैल सकती है कि भारतीय औधोगिक क्षेत्र में उनका भी हिस्सा है, लेकिन इस कपोल कल्पना से उनके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं होता दिखाई दे रहा है। परिवर्तन तो तब माना जायेगा जब यह नया पूंजीपति वर्ग अपनी कम्पनीयों की नौकरीयों में आरक्षण की शुरूआत करे। लेकिन यह वर्ग भी ऐसा नहीं करेगा, क्योंकि जब मुनाफे की बात आती है तो पूंजीपति का रंग बदल जाता है चाहे उसका वास्ता समाज के किसी भी वर्ग से रहे। अगर यह वर्ग भी नीजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने की पहल नहीं करता है तो फिर फिक्की और डिक्की में क्या फर्क है ? सिर्फ सत्ता के स्थानान्तरण से तो वंचित समुदाय की समस्याओं का हल होने वाला नहीं है। क्या इनके उधोगों में मजदूरों का शोषण नहीं होता है, क्योंकि शोषण के बिना पूंजीपति बना ही नहीं जा सकता है। इन उधोगपतियों का 2011 का लक्ष्य हेलिकाॅप्टर लेना है न कि दलित समाज का हित करना। कुछ लोगों के पूंजीपति बन जाने के कारण किसी भी समाज का भला होने वाला नहीं है। कुछ लोगों का तर्क है कि इनके उधोगपति बन जाने से दलित समाज के लोगों को औधोगिक क्षेत्र में आने का मनोबल बढ़ेगा लेकिन दलित समाज की समस्याएं सामाजिक और राजनैतिक है और उनका सामाधान भी सामाजिक राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन से ही हो सकता है। सामाजिक न्याय की लड़ाई केवल वो ही वर्ग लड़ सकता है जो समस्याओं से जूझ रहा है। लेकिन अगर यह वर्ग सामाजिक न्याय के संघर्ष में आर्थिक रूप से मजबूत कर पाये तो संघर्ष आगे बढ़ पायेगा। और वर्ग संघर्ष व वर्ण संघर्ष के बीच सामंजस्य बैठा पाते है या नहीं। यह तो इनको तय करना है कि इस संघर्ष इनकी क्या भूमिका होगी, एक पूंजीपति की या फिर सामाजिक न्याय के संघर्ष के कार्यकर्ता की। पूंजीपति आख़िर पूंजीपति है चाहे वो किसी भी समाज का हो, उसके हित संघर्ष के लक्ष्यों से अलग होते है।

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

घूमावदार सत्य

‘इस ट्रक के भी विभिन्न पहलू थे जैसे सत्य के कई पहलू होतें हैं।’ रागदरबारी के इस वाक्य का अर्थ मुझे उस समय समझ में आया, जब मैंने सत्य के कई पहलू देखे। ‘सत्य’ एक ही था मगर उसे विभिन्न दृष्टिकोणों से देखकर अलग-अलग अर्थ निकाले जा रहे थे। मेरे एक मित्र को बिहार जाना था, इस कारण मुझे ट्रेन का तात्कालिन टिकट लेने के लिये सुबह चार बजे सरोजनी नगर रेलवे स्टेषन जाना पड़ा। आरक्षण खिड़की के खुलने का समय सुबह आठ बजे था मगर लोगों की कतार इतनी लम्बी थी कि कुछ लोग रात के आठ बजे से ही बिस्तर डाल कर सो रहे थे। खैर, जब मैं लाइन में लगा तो मेरे आगे लगभग सौ लोग थे। औरतों के लिये अलग से लाइन थी। यह दीदी के दौर की राजधानी ट्रेन की कहानी है। जैसे आमतौर पर भीड़ में होता है वैसे ही कभी कभी लोगों में झड़पें हो रही थी।
अचानक औरतों की कतार मंे शोर-षराबा होने लगा, लोगों का एक रैला उस तरफ उमड़ा और कुछ ही देर में धक्का मुक्की होने लगी। मैं भी दौड़कर उनके पास पहुंचा और भीड़ को चीरता हुआ घेरे के बीच तक जा पहुंचा। तीन औरतों में आपस में झगड़ा हो रहा था जिसमें दो सक्रिय रूप से भाग ले रही थी और एक बीच में कभी कभार हस्तक्षेप कर रही थी। झगड़े का कारण था कि जो औरत कम बोल रही थी वो रात को आठ बजे आकर लाइन में लगी थी मगर उसका बच्चा रोने लगा और वो बच्चे को लेकर घर चली गई। जाते समय अपने आगे वाली औरत को को बोलकर गई थी कि मेरा नम्बर तेरे पीछे है, यही सत्य का एक पहलू था। जब वो सुबह लौटकर आयी तो उसकी जगह पर एक तीसरी औरत थी जो उसे लाइन में नही जगने दे रही थी। उसका कहना था कि एक बार आकर कह गई कि यहां मेरा नम्बर है उसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि मैं यहां रात भर बैठी रही हूं। यह भी सत्य था कि वो औरत वहां रात भर बैठी रही, दूसरा पहलू भी हो गया। झगड़ा आगे ओर पीछे वाली औरत में था जिसमें आगे वाली औरत का बस इतना ही कहना था कि बीचवाली औरत रात को आकर गई थी। यह भी सत्य था जो सबसे प्रभावषाली था और इसीलिये जिस औरत के कारण झगड़ा हो रहा था वो चुप थी, लड़ाई के दोनों पक्ष आगे पीछे वाली औरतें सम्भाले हुए थी। एक साथ सत्य के तीन पहलू थे और तीनों अपनी अपनी जगह सत्य से जुड़े हुए थे।
अचानक सत्य का चौथा पहलू उजागर हुआ जो सबसे खतरनाक था। एक आदमी भीड़ से निकलकर आया जिनका इन तीनों औरतों और कतार से कोई संबंध नहीं था। आते ही बोला, ‘तुम औरतों को तो लड़ाई झगड़े के अलावा कोई काम नही होता है, चुपचाप बैठ जाओ।’ जब इस वाक्य का उन तीनों औरतों ने विरोध किया तो धीरे धीरे पुरूषों की जमात झगड़े के मैदान मे टपक पड़ी जिनका इस झगड़े से दूर दूर तक कोई संबंध नही था। अब यह लड़ाई औरतों के बीच कतार के नम्बरों से बदल औरत और पुरूष के बीच की लड़ाई का रूप धारण कर चुकी थी। यह पूरा तबका झगड़े के शांत करवाने के बजाये मजाक के मकसद से शामिल हुआ था। अतः में तीनों औरतें चुप बैठ गई।
चौथा पहलू सत्य के तीन अलग अलग पहलूओं से हटकर पुरूषवादी समाज का सटीक चित्र प्रस्तुत कर रहा था। भारतीय समाज में आज भी औरतों को पर जाति और धर्म के नाम पर जुल्म ढ़ाये जाते हैं उनके पीछे एक बहुत बड़ा कारण है कि सामाजिक व्यवस्था में औरत को समाज का बराबर का हिस्सा माना ही नहीं जाता है। समाज में औरत और पुरूष दोहरी नैतिकता को स्थापित किया गया है जिसके उदाहरण रोज अमानवीय घटनाओं के रूप में सामने आते है। समाज में बच्चें के जन्म से ही उसमें इस भवना को बढ़ावा दिया जाता है कि पुरूष श्रेष्ठ है और औरत के भोग की वस्तु है और ऐसे कुसंस्कार अनपढ़ समाज के आलावा पढ़े लिखे समाज में भी धड़ले से पोषित होते है। पढ़े लिखे समाज में तो कहीं कहीं इतनी विद्रुपताएं देखने को मिलती है कि जो स्त्री अधिकारों की बात करतें हैं वो ही अपने निजी जीवन में सामंतवादी और पुरूषवादी मानसिकताओं से जकड़े रहते है।
चौथे पहलू को मैंने गांव में भी देखा था और शहर में भी देखा है, दोनों जगह पर बाकि भौतिक संसाधनो में तो बहुत बड़ा अंतर है, शोषण के तरीके बदले हुए है मगर शोषण का रूप वही है, कितना सार्वभौमिक है यह सत्य का चौथा पहलू। काश! वो तीनों सत्य मिलकर चौथे का जवाब दे पाते।

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

पद की गरिमा

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में निर्णय दिया है कि राज्यपालों को बदलने के लिये पुख्ता वजह का होना जरूरी है, इस निर्णय ने फिर से राज्यपाल के पद को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। भारतीय राजनीति में राज्यपाल का पद सबसे विवादास्पद पद हो गया है, जब सरकारें बदलती है तब राज्यपालों का हटना भी शुरू हो जाता है। भारतीय लोकतंत्र मंे यह सवाल बार उठता है कि राज्यपाल के पद का क्या मतलब है? इस सवाल के पिछे बहुत से कारण में से एक कारण यह भी है कि आजादी के बाद इस पद की गरीमा को भूलकर इसे एक राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। विभिन्न राजनैतिक दलों के आपसी मतभेदों के कारण इस संवैधानिक पद की गरीमा को बार बार उछाला गया है। जब कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति को केन्द्र में मंत्री पद नहीं मिल पाता है या उसे सक्रिय राजनीति से हटाना हो तो उसे किसी राज्य का राज्यपाल नियुक्त कर दिया जाता है, इससे दो फायदे है- एक तो पार्टी का एक नेता संतुष्ट हो जाता है जिससे पार्टी में विद्रोह की आषंका नही रहती और दूसरा फायदा है कि अगर राज्य में विरोधी दल की सरकार है तो उसके खिंच तान करने के लिये भी इस पद का उपयोग कर लेते हैं और यह परम्परा सी पन गई कि राज्यपाल सताधारी दल का राजनेता ही होगा। कुल मिला कर यह पद केन्द्रीय राजनीति का राज्यों पर नियंत्रण रखने का एक साधन हो गया है। झारखण्ड और बिहार के राज्यपालों का हाल पिछले दिनों देख ही चुके है, जब भी किसी राज्य में कोई राजनीतिक संकट आता है तो राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, लेकिन दुर्भाग्यपुर्ण बात यह है कि जब भी ऐसी स्थिति आती है तो इस पद को विवादों के घेरे में पाते है।
संसदीय लोकतंत्र में केन्द्र और राज्य के बीच राज्यपाल एक सेतु का काम करता है, इस पद की उपयोगिता खासकर तब देखने को मिलती है जब मंत्रिमंडल भंग हो जाता है लेकिन ऐसी स्थिति में भी किसी पार्टी विषेष की वफादारी के कारण कई बार पक्षपात का आरोप लगाया जाता है। संवैधानिक पद होते हुए भी राज्यपाल को विषष संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है, केवल शाही खर्चे का प्रतीक बनकर रह जाता है। हाल के वर्षों में धारा 356 के गलत उपयोग के मामले भी सामने आ रहे है जो स्पष्ट करते है कि इस पद के महत्व व अधिकारों को लेकर पुनर्विवेचना हो। ऐसी स्थिति में सुप्रिम कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है, लेकिन सवाल उठता है कि वो पुख्ता वजह क्या होगी? जब तक इस पद पर राजनीतिक लोगों को आरूढ़ किया जाता है तो निष्चित रूप से वो अपनी पार्टी के प्रति वफादारी दिखाने की कोषिष करेंगे, अगर राज्यपाल विरोधी पक्ष का है तो वो अपने अपने आप में एक वजह बन जायेगी। सुप्रिम कोर्ट ने इस फैसले में बताया है कि राष्ट्रीय नीति के साथ राज्यपाल के विचारों का मेल नहीं होने के कारण उसके कार्यकाल में कटौती करके हटाया जा सकता है और वो केन्द्र सरकार से असहमत भी नही हो सकते अर्थात केन्द्र में जिस पार्टी की सरकार हो उसे पूरी छूट है कि वो राज्यपाल को जब चाहे हटा सकते है। राज्यपाल का पद पूर्णरूप से राजनीतिक आकाओं के रहम पर निर्भर हो गया है जो कि एक स्वतंत्र संवैधानिक पद है।
6 दषक के संवैधानिक अनुभव के आधार पर साफ जाहिर है कि राज्यपाल के पद की पुर्नविवेचना जरूरी हो, इसे एक संवैधानिक पद के रूप में स्थापित किया जाये और राजनीतिक चालबाजीयों से अलग करके स्वतंत्र अभिनेता का स्थान दिया जाये जो संविधान के अनुसार राज्य और केन्द्र के मध्य अपनी भूमिका निभाये।

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

प्रवासी मजदूर मताधिकार अभियान

बिहार की खराब हालत के कारण लोगों का पलायन वर्षों से लगातार जारी है, इस पलायन में दिन प्रतिदिन बढ़ोत्तरी ही हो रही है, वहीं दूसरी तरफ बिहार सरकार को विकास की सरकार के नाम से प्रचारित किया जा रहा है। 2007, 2008 एंव 2009 के दौरान बेगुसराय, कुसहा एंव सीतामढ़ी में तटबंध टूट कर बिहार में सैलाब आए। इसी सरकार के दौरान 2009 में बिहार के कुछ जिले एंव 2010 में अधिकांश ज़िले सूखे की चपेट में आए। राहत की घोषणाएँ तो बहुत हुईं लेकिन पीड़ितों तक कितनी राहत पहुँची यह एक विवाद का विषय है। इस वर्ष भी राज्य एक ओर तो भीषण सूखे की चपेट में है वहीं दूसरी ओर सारण में गंडक नदी पर बना तटबँध टूट गया है और दर्जनों गाँव बाढ़ के ख़तरे से जूझ रहे हैं। तटबँधों के रख-रखाव के मामले में शासन पूरी तरह से असफल साबित हो रहा है।
1990 के भूमण्डलीकरण के कारण एंव पिछले 10 सालों से लगातार बाढ़ व सूखे के कारण पलायन प्रतिशत में और एजाफा हुआ। दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता जैसे शहरों में बिहारी प्रवासी मजदूरों की संख्या बहुत अधिक है, पंजाब जैसे राज्य में खेती के लिए खास तौर पर बिहार से खेत मजदूर बुलाए जाते हैं।
राज्य में मनरेगा एंव बी.पी.एल. जैसी सभी सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं की हालत दयनीय है। अगर हम बिहार की शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, सिंचाई, बिजली आपूर्ति जैसे मुद्दों की बात करें तो पता चलता है कि पिछले 5 वर्षों में भी कोई सार्थक प्रयास नहीं हुए है। अगर बिहार को बाढ़ और सूखे से बचाया गया होता और आम लोगों को सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं का लाभ मिला होता तो आज बिहार से इतनी अधिक संख्या में लोगों का पलायन न हो रहा होता।
बिहार से पलायन कर दूसरे शहरों में रोज़गार के लिए जाने वालों की संख्या लगातार बढ़ती हुई दिखती है, जिसका सही आंकड़ा किसी के पास भी मौजूद नहीं है। दूसरे शहर में रह कर काम करने वाले ये असंगठित क्षेत्र के मजदूर हमारे जनतंत्र में अपने मताधिकार का प्रयोग भी नहीं कर पाते हैं। चूँकि अन्य शहरों से बिहार वापस जाकर वोट देना इन मजदूरों के लिए संभव नहीं, इसलिए इनके मुद्दे भी चुनाव में शामिल नहीं होते। ऐसा महसूस होता है मानो बिहारी मज़दूरों को अन्य शहरों में सम्मान के साथ जीने का कोई अधिकार ही नहीं है। इन मजदूरों पर जब कभी किसी भी प्रकार का हमला होता है, उस समय कोई राजनैतिक पार्टी या राजनेता ज़ुबानी जमाख़र्च के अलावा कोई सार्थक प्रयास नहीं करते। कोई बिहारी अस्तित्त्व पर सम्मेलन कर देता है तो कोई नारेबाज़ी तक अपने आप को सीमित रखता है। न ही उन प्रदेशों में प्रभावी तौर पर कोई अन्य दल मज़दूरों के साथ खड़ा होता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह लगती है कि इन प्रवासी मज़दूरों का इस जनतंत्र में कहीं वोट देने का अधिकार ही नहीं है। अपने इलाक़े से पलायन कर रोज़गार की तलाश में देश के किसी भी कोने में जाने वाले ये असंगठित क्षेत्र के मज़दूर चुनाव के समय न तो अपने शहर वापस जा कर वोट दे पाते हैं और न ही जिन शहरों में वे काम कर रहे हैं वहाँ उनको वोट देने का अधिकार होता है। शहर के ऐसे तमाम लोग जो चुनावी प्रतियाशियों को वोट देकर कामयाब बनाने का अधिकार नहीं रखते, हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था ऐसे लोगों को रोज़गार, राशन, बिजली, पानी और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत ज़रूरतों से भी वंचित रखतीे है। दूसरे शब्दों में जनतंत्र में वही जी पाता है जो जनतंत्र का हिस्सा है।
पलायन के लिए ज़िम्मेदार मज़दूर नहीं सरकार की नाकामियाँ और इच्छा-शक्ति का अभाव हैं। सरकार की नाकामियों के कारण लोगों से उसके मतदान का हक़ छिन जाए तो नागरिकता और जनतंत्र दोनों ख़तरे में दिखाई देते हैं।
जनतंत्र में केवल उनका सम्मान किया जाता है जो वोट देते हों, जिनका वोट नहीं होता उनके मुद्दे हमेशा दबे रह जाते हैं।
पिछले दिनों में हमारी बातचीत के दौरान इस समस्या के समाधान के लिये निम्न सम्भावनाएं सामने आयी:-
1. मजदूर जहां पर रहते है, ज्यादा से ज्यादा संख्या में उन्हें वहां का मतदाता बनाया जाये। या
2. लोकसभा, विधानसभा और पंचायत चुनावों में आने जाने का यात्रा भता दिया जाये। या
3. मजदूर जहां पर रह रहे हैं वहां पोस्टल बैलेट की व्यवस्था की जाये। या
4. मजदूर के रहने के स्थान पर पोलिंग बूथ लगाये जायें। या 5. इसके अलावा सम्भावनाओं को तलाश किया जाए।
इस समस्या के बाबत हम चुनाव आयोग को ज्ञापन भी दे चुके हैं और आने वाले समय में बिहार विधानसभा चुनावों के 6 चरणों के दौरान दिल्ली में मजदूरों से अपील भी कर रहे हैं कि बिहार जा कर ज्यादा से ज्यादा मतदान में भाग लें, फिर भी जो मजदूर चुनाव में शामिल नहीं हो पाऐंगे वह चुनाव आयोग को पत्र लिख कर इस बात की सूचना देंगे कि वह अपने मताधिकार का प्रयोग दिल्ली में रहने की वजह से नहीं कर पा रहे हैं, यही हमारे वोट हैं इन्हें स्वीकार करें अर्थात चिट्ठी के माध्यम से चुनाव आयोग को अपना वोट दर्ज करायेंगे।

अंतिम चरण के चुनाव के दिन 20 नवम्बर 2010 को मतपत्र के रूप में सभी पत्र चुनाव आयोग को सोंपे जायेंगे ,
बिहार बाढ़ विभीषिका समाधान समिति के सदरे अलम ने बताया कि इस अभियान कि अपील सभी राजनैतिक दलों को भेजी जाएगी , अमन ट्रस्ट के जमाल किदवई ने बताया कि हाल ही में ए एन सिन्हा संस्था (पटना) कि एक रिपोर्ट आई है , जिसमे बताया गया है कि बिहार के ३० % मत दाता पलायन कर गए हैं जो चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे उनके मुताबिक श्रीनगर में एक लाख से अधिक बिहारी मजदूर हैं जो वोट नहीं करते

सोमवार, 23 अगस्त 2010

कैसे बाज आयें कबूतरबाज

विदेश में नौकरी दिलाने का झांसा देकर पैसे हड़पने की घटनाएं रोज सामने आनी लगी हैं। बाहरी देशों में जाकर मजदूरी करने वाले मजदूरों में ज्यादातर मजदूर खाड़ी देशों में जातें हैं और खाड़ी देशों में रोजगार दिलाने वाले कबूतरबाजों का जाल पूरे देश में फैला हुआ है। पिछले दिनों में लीबिया में 116 भारतीयों को बंधक बनाने की खबरें आयीं हैं जिन्हें कबूतरबाजों द्वारा अच्छी पगार और बेहतर रोजगार का झांसा देकर लीबिया भेजा गया, जहां पर अच्छी तनख्वाह तो दूर खाना तक नहीं दिया गया। ऐसे वाकयात बहुत से बेरोजगारों के साथ हाते रहते है। कबूतरबाजी के इस धंधे में ज्यादातर गरीब मजदूर फंसतें हैं क्योंकि एक ओर तो देश में रोजगार की कमी है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में और दूसरी बात यह है कि मजदूरी के लिये विदेश भेजने की सरकारी स्तर पर कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसी स्थिति में सच्चाई जानते हुए भी मजदूरों को इन कबूतरबाजों का सहारा लेना पड़ता है जो लाखें रूपये लेकर ठगते हैं। ये सबसे पहले तो बेरोजगारों को अच्छी पगार और बेहतर रोजगार के सपने दिखातें हैं और नहीं मिलने पर पैसे वापस करने के खोखले वादे भी करतें हैं। जब इन मजदूरों की विदेशों में दुर्दशा होती है, बेहतर रोजगार तो दूर कम्पनीयों और मालिकों द्वारा मानवीय व्यवहार भी नहीं किया जाता तो बहुत से मजदूर तो वापस लौट आतें हैं और जो नहीं लौटतें है उनकी स्थिति दयनीय होती है। जब वापस लौटकर पैसा मांगतें हैं तो कबूतरबाज पैसा वापस करने से इंकार कर देते हैं। ऐसी स्थिति में पीड़ित पक्ष अगर कानून की शरण में जाता है तो भी उन्हें कोई फायदा नहीं होता है क्योंकि कानून को सबूत चाहिये और मजदूरो व ठगी कबूतरबाजों के बीच कोई लिखित समझौता तो होता नहीं है और बहुत से मामलों में तो गवाह पेश करना भी मुश्किल हो जाता है, तब कबूतरबाज आराम से कानून की पकड़ से बच जातें हैं। इन कबूतरबाजों का जाल गांवों से लेकर बड़े शहरों तक फैला हुआ है जिसकी गिरफ्त में अधिकतर बेरोजगार युवा आते हैं। यह समस्या न केवल कबूतरबाजों द्वारा लोगों को ठगने की है बल्कि यह मुख्यरूप से समाज की उन हालातों की और संकेत करती है जो एक ओर तो ऐसे ठगी लोगों के पनपने का रास्ता साफ करती है, दूसरी ओर लोगों को इनके पास जाने को मजबूर भी करती है जिसके कारण बड़े पैमाने पर श्रम का शोषण होता है।
देश में संसाधनों का बंटवारा कुछ इस प्रकार से हुआ है कि खुशहाली कुछ मुटठीभर लोगों के हिस्से में चली गई और समाज के एक बड़े तबके को बदहाली की स्थिति में जीना पड़ रहा है। मगर इससे भी बड़ा सवाल है कि आबादी लगातार बढ़ती जा रही है और संसाधन सिमित हैं, ग्रामीण क्षेत्र में नए रोजगारों का सृजन नहीं हो रहा है जबकि परम्परागत रोजगार के साधन दिनोंदिन घटते जा रहें हैं। इस पूरे परिदृश्य ने युवाओं के सामने चनौती खड़ी कर दी कि आखिर वो क्या करंे ? यहीं से बहुत सी समस्याओं का जन्म हो जाता है जिन्हें आज हम हमारे चारों ओर के समाज में देखतें हैं और इन कबूतरबाजों का मामला भी उसी का हिस्सा है। जबकि पुलिस व प्रशासन को इन कबूतरबाजों के बारे में पूरी जानकारी रहती है क्योंकि लोगों के संवादों में ये इतने प्रचारित किये जातें हैं कि प्रशासन को आराम से पता चल जाता है। इस पर भी प्रशासन अगर यह तर्क देता है कि उन्हें पता भी नहीं था कि ऐसा कोई धंधां चल रहा है तो सवाल उठता है कि पता क्यों नहीं था ? शिकायत दर्ज होने के बाद भी इन कबूतरबाजों द्वारा लगातार लोगों को ठगा जाये तो जाहिर है कि ये कोई आम ठग या लूटेरे नहीं है बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से सक्षम व ताकतवर लोगों का गिरोह है जो अपनी शक्ति का गलत उपयोग करके लोगों को ठगता रहता है। एक गरीब बेरोजगार 1 लाख रूपये देकर नौकरी के लिये जाता है और उसे इस प्रकार से प्रताड़ित किया जाता है, यह बहुत ही गम्भीर मामला है जिस पर कोई राजनीतिक बातचित नहीं हो रही है। हो सकता है कि इन कबूतरबाजों के तार स्विस बैंक में जमा भारतीय पूंजी तक हो या बहुत से नेता व प्रशासनिक अधिकारीयों की मिलीभगत हो, अपराधीयों को देश से बाहर जाने में भी ऐसे लोगों का हाथ हो सता है जिसकी जांच होनी चाहिए।
इस समस्या का हल करने का पहला तरिका तो है कि देश में ग्रामीण क्षेत्रों में नये रोजगारो का सृजन किया जाये ताकि बेरोजगारों को विदेशों की तरफ रूख ही न करना पड़े और दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि लोगों के साथ ठगी और धोखाधड़ी करने वाले इन कबूतरबाजों के प्रति प्रशासन कड़ा रूख अपनाये ताकि एक बेरोजगार को अमावीय यातनाओं से बचाया जा सके। अगर समय रहते इन कबूतरबाजों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो ये आज तो श्रम को विदेशों में बेच रहें है कल पूरे देश को ही बेच खायेंगे।

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

नवउदारीकरण के जाल में किसान

1991 के बाद भारत विष्वव्यापी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का अंग बनता जा रहा है। खुले व्यापार और निजी निवेष के माॅडल को अपनाने के बाद प्राथमिक क्षेत्र पर लगातार संकट के बादल मंडरा रहे है और उससे कृषि व कृषि से जुड़ा हुआ तबका बूरी तरह प्रभावित हुआ है। यूरोप के देषों में औधोगिककरण के बाद खेती पर निर्भरता घटती गई मगर भारत में 1971 की तुलना 2005 में कृषि कामगारों की संख्या दुगुनी हो गई है। एक तरफ जनसंख्या के बढ़ते दवाब और दूसरी तरफ कृषि में सार्वजनिक निवेष के घटने के कारण भारतीय कृषि हाषिये पर पहुंच गई है। विष्व बैंक ने भी 2008 की रिर्पोट में कृषि को विकास के ऐजेंडे में माना है क्योंकि विकासषील देषों की अधिकांष जनता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुड़ी हुई है। वैष्विक परिदृष्य पर पूंजीवादी ताकतें विष्व बैंक व अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के माध्यम से विकासषील देषों की कृषी पर लगातार हमला कर रही है क्योंकि वे अपने टनों अनाज को बाजार में मंदी के डर से नहीं ला सकते, इसलिए समुंद्र में डुबाये जाने वाले अनाज के लिए बाजार तैयार करना चाहते है और वो तभी सम्देषों की कृषि को पूरी तरह तबाह कर दिया जाये।
भारत की जीडीपी में कृषि क्षेत्र की भागीदारी लगातार कम हो रही है और अब यह मात्र 15.7 फीसदी रह गई है क्योंकि कृषि क्षेत्र में 1991 के बाद लगातार सार्वजनिक निवेष को घटाया जा रहा है। 1991 में कृषि पर सार्वजनिक निवेष 16 फीसदी था जो पिछले वर्ष घटकर 6 फीसदी रह गया है। आर्थिक सुधारों के दौरान कृषि की अनदेखी हुई है जिसका मुख्य कारण है कि सरकार कृषि लागतों पर सब्सिडी और उपज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीतियों को ही मुख्य ऐजेंडे में रखा लेकिन कृषि पर शोध, तकनीकी विकास, सिंचाई, ऊर्जा, भंडारण व अन्य परम्परागत ज्ञान के विकास पर कोई निवेष नहीं किया। नई आर्थिक नीतियों को अपनाने के बाद भारतीय किसान वैष्विक बाजार में विकसित देषों के किसानों से प्रतिस्पद्र्धा में टिक ही नहीं पाता है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था को विष्व बाजार में प्रतिस्पद्र्धा के लिये तो खोल दिया मगर अर्थव्यवस्था के प्रारम्भिक ढ़ांचे- कृषि और प्राथमिक क्षेत्र का आधारभूत विकास ही नहीं किया गया। पिछले साल यू. पी. ए. सरकार की 78 हजार करोड़ रूपये की ऋण माफी के बाद भी किसान आत्महत्याएं कर रहे है और इस वर्ष भी कृषि वृद्धि दर पिछले वर्ष की तुलना में 0.2 प्रतिषत ऋणात्मक रही है। जिस देष में 60 प्रतिषत लोग कृषि से जुड़े हुए हो, वहां पर कृषि वृद्धि दर ऋणात्मक रहना कृषि विरोधी नीतियों को दर्षाता है। सही मायनों में ऋण माफी किसानों को फायदा देने के लिये नहीं थी, वो बड़े बैंको की एमपीए कम करने की साजिष थी जो किसानों सिर पर मढ़ दी गई। मीडिया भी कृषि मृद्दो को लेकर संवेदनषील नहीं है, 78 हजार करोड़ रूपये की ऋण माफी को ऐसे उछाला जैसे इससे भारतीय कृषि का मूलभूत ढंाचा ही बदल जायेगा लेकिन उसी साल औधोगिक क्षेत्र को 3 लाख करोड़ रूपये का टेक्स रिबेेट दिया गया जिस पर कोई सवाल नहीं उठे। कार लोन शून्य प्रतिषत ब्याज पर दिया जा सकता है लेकिन किसानो को ऋण देने के लिए सरकार ने नाबार्ड से लेकर किसान तक इतनी ज्यादा औपचारिक कड़िया बना रखी है कि उसे समय व जरूरत के मुताबिक ऋण मिल पाना मुष्किल है। नई आर्थिक नीतियों के तहत अर्थव्यवस्था को पूर्णरूप से सेवा क्षेत्र पर निर्भर करने की कोषिष की गई और प्राथमिक क्षेत्र को नजर अंदाज किया गया। आज किसान और उपभोक्ता के बीच के दलालोे की संख्या इतनी बढ़ गई है कि दोनों का पैसा बिचैलियों द्वारा हड़प लिया जाता है। एक अध्ययन के मुताबिक कृषि उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा थोक मूल्यों में 33 प्रतिषत का और थोक एंव खुदरा मूल्यों मंे लगभग 60 प्रतिषत का अन्तर होता है। अगर एक किसान अपनी उपज का 100 रूपये पाता है तो उपभोक्त द्वारा 200 चुकाये जाते है। बीच के 100 रूपये सप्लाई चैन सिस्टम की कमजोरी के कारण बिचैलियों के जेब में जाते है। आज भारतीय कृषि एक घाटे का व्यवसाय बन गई है जिसके मुख्य कारण प्राकृतिक प्रकोप और नई आर्थिक नीति के तहत कृषि विरोधी नीतियों का लागू होना है। कृषि के पिछड़ेपन और ग्रामीण रोजगार के अभाव में बहुत बड़ा तबका शहरों की ओर पलायन कर रहा है जिसके कारण शहरो की अर्थव्यस्थाओं का ढंाचा भी चरमरा रहा है। कृषि क्षेत्र को दिये जाने वाले कर्ज में पिछले कुछ सालों में काफी वृद्वि हुई है। 1996-97 से 2003-04 के बीच यह 14.27 प्रतिषत वार्षिक वृद्धि की दर से बढ़ा है लेकिन कृषि क्षेत्र में वास्तविक निवेष नहीं बढ़ा है। कृषि में सार्वजनिक निवेष और कृषि सब्सिड़ी में विपरीत संबंध दिखाई देता है।
1990 के दषक में विष्व पटल पर समाजवादी आंदोलन का नेतृत्वकर्ता सोवियत संघ के विघटन के कारण पूंजीवादी ताकतों को खुला मैदान हो गया और विष्व एकधुव्रीय व्यवस्था में तबदील होने के कारण बहुत से विकासषील देषों ने मजबूरी में नवउदारवादी नीतियों को अपनाना पड़ा, भारत भी उसी लपेटे में आ गया था। भारतीय कृषि को अमेरिकी सांचे में ढ़ालने के लिये नीति निर्धारकों से लेकर कृषि की शोध संस्थाएं उदारीकरण के पक्ष में तर्क देने में जुट गई, इसीलिए भारतीय कृषि वैज्ञानिक बंजर भूमी को उपजाऊ बनाने की तकनीक खोजने के बजाय बीटी बीजों की वकालत करने लगे। आज देष में 50 से अधिक कृषि विष्वविधालय हैं मगर उनकी उपलब्धियां क्या हैं ? कृषि अनुसंधान और षिक्षा भी भारतीय कृषि के संकट के लिये जिम्मेदार है, क्योंकि वो भारतीय कृषि की समस्याएं और परिस्थितियों पर शोध करने के बजाय इस बात पर शोध कर रहा है कि भारतीय कृषि को अमेरिकन मोडल में कैसे ढ़ाला जाये और इसी कारण मूलभूत समस्यायों को गौण कर दिया गया। आजादी के बाद लगातार एक तरफ बिहार में बाढ़ ने लोगों को तबाह करके रखा और दूसरी तरफ राजस्थान में हर साल अकाल पड़ता है मगर हमारी सरकारों ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया कि बाढ़ का पानी सूखे की तरफ मोड़ कर दोनों तबाहीयों को बचाया जा सकता है। क्योंकि अगर ऐसा हो गया तो अकाल राहत और बाढ़ राहत के नाम पर जो करोड़ों के फंड दिये जाते है उनमें धांधली कैसे होगी? दरअसल में नवउदारवादी नीतियों का चरित्र ही ऐसा है कि वो चंद लोगों के लिये लूट का हथियार है। विकास के नाम पर किसानों को सहायता देने के बजाय उन्हें जमीन से बेदखल करने के पट्टे भी बहुराष्ट्रीय कम्पनीयों को दे दिया है। सच्चाई तो यह है कि भारतीय किसान कभी प्रकृति से नहीं हारा है क्योंकि प्रकृति हमेषा संतुलन बनाये रखती है मगर नई आर्थिक नीतियों ने तो किसान से लेने की ही नीति अपनाई है उसे बदले में कर्ज के सिवाय मिलता कुछ नहीं।
देष में लगातार किसान आत्महत्याएं कर रहें हैं, पिछले 12 सालों में 2 लाख किसानों द्वारा आत्महत्या करना नवउदारवादी नीतियों का ही परिणाम है और सरकार कर्ज माफी का एक पैकेज देकर इति श्री कर ली लेकिन सवाल उन नीतियों को बदलने का है जिनके कारण आज भारतीय किसान हाषिये पर पहुंच गये है, चाहे सब्सिडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाने की बात हो या फिर नई तकनीक और संसाधन उपलब्ध कराने की हो, किसानों को हर जगह लूटा जाता है। राजनैतिक रूप से किसानों का ऐसा कोई वोट बैंक नहीं है जिसके कारण राजनीतिक दल उन्हें महत्व दें क्योंकि वोट को तो पहले से ही जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर विभाजित कर दिया गया है। कुछ तथाकथित किसान नेता जरूर हैं जिन्हे न तो किसानों की वास्तविक समस्याओं का पता है और न किसान की हालत का। असल में वो जमीन के मालिक जरूर है मगर जमीन पर खुद कभी खेती नहीं की, वो जमींदार है जिनके यहां भूमिहीन मजदूर काम करते है लेकिन वो सरकार की परिभाषा के हिसाब से किसान है क्योंकि सरकार उसी को किसान मानती है जिसके नाम पर जमीन हो। उनके किसान नेता बनने के पीछे तर्क यह है कि किसी अन्य राजनीतिक दल में जगह नहीं मिलने के कारण खुद को राजनीतिक धरातल पर स्थापित करने के लिये किसान राजनीति के नाम पर जहां मौका मिले भाषणबाजी करते रहते हैं।
सप्रंग सरकार के दूसरे कार्यकाल के एक वर्ष पूरे हो जाने पर रिर्पोट कार्ड जारी करके करकार अपनी पीठ थपथपा रही है जबकि इसी सरकार की किसान विरोधी नीतियों के कारण महंगाई में किसान बदहाल है, एक तरफ तो वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं और वही दूसरी तरफ किसान को फसल का उचित मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है। मनमोहन सिंह का अर्थषास्त्र किसानों के लिये न होकर, ठेकेदारों और बिचोलियों के हित में है मगर सप्रंग सरकार जबरदस्ती उसे अपनी उपलब्धीयों मनाने पर अड़ी हुई है। एक तरफ भारत में किसानों को दिया जाने वाला अनुदान घटाया जा रहा है और दूसरी तरफ दुनियां के विकसित देष कृषि अनुदान को बढ़ा रहे है, ऐसी स्थिति में भारतीय किसान कैसे वैष्विक बाजार में टिक पायेगा जिसके दरवाजे बिना तैयारी के ही खोल दिये गये है। नवउदारवादी नीतियों का मुख्य ऐजेंडा है कि भारतीय कृषि किसानों से छीनकर बहुराष्ट्रीय कम्पनीयों के हाथ में चली जाये। कृषि संकट से उभरने के लिये दुसरी हरित क्रांति का शंखनाद करने की तैयारी करने वाले भूल रहे है कि किसान बढ़ती लागत और उपज के घटते मूल्य की दोहरी चक्की में पिस रहा है न की तकनीक और उन्नत किस्म के बीजों के अभाव में। किसान व कृषि को वैष्विकरण के दानव से बचाने के लिये ऋण माफी व अन्य रियायतों की बजाय क्षि नीतियों को बदलने की जरूरत है जो किसान को आज ‘मुक्त बाजार’ के ऐसे बनिये के जाल में फंसा दिया है जिसके बही खातो से लेकर हिसाब किताब की भाषा ही भारतीय किसान विरोधी है।

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

दूसरी हरित क्रांति वैकल्पिक कृषि के रास्ते

कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिये भारत सरकार ने कार्यसमूह गठित किया है और उस कार्य समूह के अध्यक्ष का मानना है कि दूसरी हरित क्रांति जरूरी है। एक तरफ देष में तिव्रगती से बढ़ती हुई जनसंख्या और दूसरी तरफ कृषि का लगातार पिछड़ापन एक भयानक खाद्यान्न संकट का संकेत देते हंै। ऐसी स्थिति में वैकल्पिक कृषि भारत का पेट भर सकती है, इसमें क्रांतिकारी सम्भावनाएं है। वैकल्पिक कृषि में श्रम की उपादेयता बढ़ जाती है, इसलिए यह रोजगार सृजन और बेरोजगारी का भी कुछ हद तक निवार्ण करने में सहायक है। कृषि क्षेत्र में ज्ञान के नियमित प्रयोग और स्थानीय संसाधनों के बढ़ते प्रभाव के कारण कृषि में विकेंद्रीकृत विकास की अपार संभावनाएं नजर आती है। इन सबके बावजूद एक अहम सवाल खड़ा होता है कि क्या वैकल्पिक कृषि खाद्यान्न संकट से निजात दिला सकती है ? दुनियांभर में जैविक कृषि पर हुए अध्ययनों से स्पष्ट है कि यह लघु और सिमान्त किसानों के लिये उपयोगी है क्योंकि एक तो इसमें उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई है और दूसरा कारण है कि छोटी जोतों पर नए नए प्रयोग आसानी से किये जा सकते है। लेकिन वैकल्पिक कृषि अपनाने वालों के प्रषिक्षण पर भी इसकी उत्पादकता और गुणवता निर्भर करती है और भारत में दूसरी हरित क्रांति के लिये जरूरी है कि उचित प्रषिक्षण, तकनीकी और उन्नत किस्म के बीज व रासायनिक उर्वरक उपलब्ध कराये जायें। जहां तक किमतों का सवाल है तो यूरोप के देषों का अनुभव बताता है कि सामान्य बाजार भावों में भी वैकल्पिक कृषि मुनाफा कमा सकती है क्योंकि इसकी प्रति हैक्टेयर उत्पादन लागत कम होती है और उत्पादन की मात्रा भी तुलनात्मक रूप से ज्यादा होती है।
अब अगर वैकल्पिक कृषि के नकारात्मक पहलूओं की चर्चा करें तो इससे स्थानीय बीजों, पशुधन एवं परम्परागत ज्ञान नष्ट होता है और इसी कारण विष्व बाजार में विकासषील देषों के उत्पाद विकसित देषों की तुलना में पिछड़ जाते है। वैकल्पिक कृषि में प्रयोग में ली जाने वाली प्रक्रियाएं स्थान और फसल विषेष के लिये होती हैं उन्हें हर जगह ज्यूं का त्यूं इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता है और भारतीय संदर्भ में देखा जाये तो इतनी ज्यादा भौगोलिक और प्राकृतिक विभिन्नताएं है कि वैकल्पिक कृषि पद्धति पर ही प्रष्नचिंह खड़ा हो जाता है। भारत में छोटे छोटे किसानों के पास इतना पैसा नहीं होता है कि वो उन्नत तकनीक और रासायनिक बीजों का प्रयोग कर सकें और न ही उन्हें वक्त व जरूरत के अनुसार बैकों से ऋण मिल पाता है। 2007 की राष्ट्रीय किसान नीति में भी जैविक कृषि को कुछ चुनिंदा क्षेत्रों के लिये ही उपर्युक्त माना है क्योंकि अभी तक भारत में इस संदर्भ में शोध व प्रयोग ही बहुत कम हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हमारी भूमि का दो तिहाई हिस्सा लगभग विकृत हो चुका है और लगातार कृषि योग्य भूमि में कमी आ रही है क्योंकि परम्परागत कृषि पद्धतियों से इतनी बड़ी जनसंख्या के लिये खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना मुष्किल है। ऐसी स्थिति में अगर वैकल्पिक कृषि को नहीं अपनाया गया तो आने वाले समय में भूख भारत की सबसे बढ़ी समस्या होगी। कुछ लोगों का तर्क होता है कि वैकल्पिक कृषि कितनी भी अच्छी हो लेकिन मषीनीकरण और आधुनिककरण के कारण कृषि में श्रमशक्ति घट जायेगी और बेरोजगार बढ़ जायेगी परन्तु उत्पादन और तकनीक के विकास के साथ गांवों में नये नये रोजगारों का सृजन होगा जिससे बेरोजगारी भी कम होगी और गांव से शहर की तरफ होने वाले पलायन में भी गिरावट आयेगी। क्योंकि जब गांव में ही रोजगार मिल जायेगा तो मजबूरी में होने वाले पलायन पर तो रोक लग ही जायेगी।
भारत में वैकल्पिक कृषि के विकास के लिये जरूरी है कि सराकर उचित संसाधन और तकनीक उपलब्ध कराये, साथ ही साथ भौगोलिक विभिन्नताओं को देखते हुए अलग अलग क्षेत्र के लिये विषेष शोध कराकर उसे किसानों तक पहुंचाये ताकि समय पर उससे किसान लाभांवित हो सके। दूसरी हरित क्रांति का रास्ता वैकल्पिक कृषि से होकर ही जायेगा, इसके लिये सरकार और किसान दोनों को तैयार रहना चाहिए क्योंकि शरूआती दौर में बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। मूलतः समाज और सरकार को वैकल्पिक कृषि को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि आने वाले समय में भारत और दुनियों को खाद्यान्न संकट से यही उभार सकती है। जरूरा नहीं है कि सभी फसलों में वैकल्पिक कृषि को अपनाया जाये क्योंकि जिन फसलों में परम्परागत ज्ञान से कम खर्चे पर अच्छी उपज प्राप्त हो रही है उन्हें उसी प्रकार से चलने दिया जाये। इस प्रकार एक स्तर पर परम्परागत कृषि और वैकल्पिक कृषि में सामंजस्य भी जरूरी है। चाहे किसानों की आत्महत्यों का सवाल हो या कृषि क्षेत्र में बढ़ती अन्य समस्याएं, वैकल्पिक कृषि इन सब का एक हल प्रस्तुत करती है। देष में कुछ जगहों पर इसके प्रयोग चल रहे है जो बहुत हद तक सफल भी है मगर अब इसे बड़े फलक पर उतारकर दूसरी हरित क्रांति का शंखनाद करना समय की मांग है।
वैकल्पिक कृषि को अपनाने के लिये किसानों और सरकार को एक दूसरे का सहयोगी होना पड़ेगा।

सोमवार, 19 जुलाई 2010

शहर के हकदार


राष्ट्रमंडल खेलों के पीछे एक तर्क यह भी है कि सरकार इन खेलों की आड़ में बहुत से मुद्दो को भुनाना चाहती है, जैसे- पुनर्वास व पलायन जैसी समस्याओं को। इसी कड़ी में दिल्ली को झुग्गी - झोपड़ी मुक्त बनाने के नाम पर गरीब झुग्गीवासीयों को गुमराह करने की कोषिष की जा रही है। लोगों को उजाड़ने वाले इस तंत्र ने अपना काम शुरू कर दिया है, दिल्ली सरकार ने राजीव रत्न आवास योजना के अंतर्गत 7900 फ्लैटों के आवंटन की घोषणा की है जिसके तहत 44 झुग्गी कालोनियों को फ्लैट आवंटन का कार्य शुरू हो गया है। अब सवाल उठता है कि क्या वास्तव में सरकार झुग्गी कालोनियों की समस्या को दूर करना चाहती है?
अगर इन 44 झुग्गी कालोनियों को जनसंख्या व परिवारों की गणना के आधर पर फ्लैट आवंटन किया जाये तो दो झुग्गी कालोनियों को भी यह फ्लैट कम पड़ेंगे, पुनर्वास नीति के तहत यह प्रावधान है कि 18 साल के व्यस्क को भी सरकार अलग से फ्लैट मुहैया कराये, जैसा राजगीर व खांडवा में हुआ था। मगर सरकार ऐसा नहीं करती क्योंकि दरअसल सरकारे ये चाहती नहीं कि मजदूरों की स्थिति में कोई सुधार हो। हर शहर के विस्तार का एक चरित्र व एक रफ्तार होती है। जो जगह रहने लायक नहीं होती, वहां पर मजदूरों को बसाया जाता है और जब मजदूर अपने खून पसीने से उस जगह को रहने लायक व साफ सुथरा बना लेते है तब किसी तथाकथित बहाने के नाम पर सरकारें वहां से मजदूरों को बेदखल कर देती है। अगर दिल्ली के विस्तार की कहानी को भी गहराई से देखा जाये तो यही बात सामने आती है कि कभी एषियार्ड व कभी किसी अन्य प्रोजेक्ट के नाम पर मजदूरों की जमीन को लगातार हथियाया जा रहा है। जहां पर इन झुग्गी कालोनियों को बसाया जाता है, वहां की स्थिति को देखने से साफ जाहिर है कि यहां पर न तो कोई मूलभूत सुविधाएं है और न ही कोई मानवाधिकार। सरकार चाहती भी नहीं कि इन झुग्गी कालोनियों की स्थिति को सुधारा जाये, इनमें से बहुत सी झुग्गी कालोनियां ऐसी भी है चुनावों से पहले तो वैध हो जाती है और चुनाव के बाद वापस अवैध हो जाती है। वोट लेने के वक्त बहुत से लुभावन वादे किये जाते है मगर चुनाव होते ही सब इनसे आंख भौहें सिकोड़ने लग जाते है। सबसे आष्चर्यजनक बात है कि हर साल एक बड़ी तादात में मजदूर रोजगार की तलाष मे दिल्ली आते है लेकिन सरकार के पास दिल्ली की आवासीय स्थिति को लेकर कोई ठोस रणनीति नहीं है। न तो सरकारे गांव से शहर की ओर हो रहे इस अंधाधुंध पलायन के कारणों का निवार्ण कर रही है और न ही शहर में इन मजदूरों की बेहतर जींदगी का कोई प्रयास।
जब तक गांव में रोजगार के साधनों का निर्माण नहीं किया जाता है तब तक पलायन को रोकना मुष्किल है क्योकि देष के एक बहुत बड़े इलाके में लगाातार बाढ़ व सूखे का प्रकोप रहता और सरकार की उदासीनता के कारण इन प्रकोपों से प्रभावित लोगों को कोई राहत नहीं मिल पाती है। हालांकि कागजों में तो बहुत सी योजनाएं व पैकेज उपलब्ध कराये जाते है मगर जमीनी हकिकत पर कुछ नहीं मिलता है। ऐसी स्थिति में गांव से शहर की और पलायन के अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं बचता है। मसला यह भी है कि एक तरफ सता यह भी चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा मजदूर गांव से शहर आये क्योंकि तभी तो उन्हें सस्ते मजदूर मिल पायेंगे, जिससे शहर को सजाया जा सके और कामनवेल्थ जैसे रौनकी कार्यक्रम किये जा सके और दूसरी तरफ यह भी चाहती है कि ये शहर में दिखाई देकर उनकी झूठी शान में खलल भी न डालें। असली शहर इन मजदूरों से ही चलता है और ये ही इसके हकदार है। महलों से लेकर सड़को तक सब कुछ बनाने के पीछे जो हाथ होते है उन्हे हेय दृष्टी से देखा जाता है।
इस देष में क्रिकेट और कामनवेल्थ की झूठी शान पर तो खर्च करने के लिये सरकारों के पास करोड़ों का बजट आ जाता है और इन झुग्गी कालोनियों वालों के जीवनस्तर को सुधारने व सामाजिक सुरक्षा के नाम पर सरकारी ख्जाना हाथ खड़े कर देता है। गांव शहर की तरफ आने का मतलब होना चाहिए कि एक बेहतर जींदगी की ओर प्रस्तान मगर आज इसके उलटा हो रहा है, शहर की तरफ मजबूरी आना पड़ता है क्योंकि आजादी से लेकर आज तक लगातार ऐसी ही परिस्थितियां बनाई जा रही है की चंद लोगों की खुषी के लिये गांवों को तबाह करके शहर के आसपास मजदूरों को बेहाल छोड़ दिया जाये, जो दिल्ली से लेकर भारत के सभी बड़े और मध्यम शहरों की स्थिती है।

दिल्ली को झुग्गी - झोपड़ी मुक्त बनाने के लिये फ्लैट देना इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। जब तक गांवों में पर्याप्त रोजगार के अवसर नहीं बढाये गये और शहरों में मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा व मूलभूत सुविधाएं नहीं दी जाती तब तक समस्या ऐसे ही बनी रहेगी।

रविवार, 18 जुलाई 2010

कामनवेल्थ: कौन कामन, किसका वेल्थ?


जैसे-जैसे अक्टूबर का महीना नजदीक आता जा रहा है वैसे ही सरकार की बैचनी बढ़ती जा रही है। दिल्ली को ‘वल्ड़ क्लास’ शहर दिखाने के लिए सौन्दर्यकरण के नाम पर करोड़ों रूपये पानी की तरह बहाये जा रहा है। जब देष में विष्व के 40 प्रतिषत भूखे लोग रहते है, 46 प्रतिषत बच्चे और 55 प्रतिषत महिलाएं कुपोषण के षिकार है। ऐसी स्थिति में सरकार हजारों करोड़ रूपये 12 दिन के खेल आयोजन पर खर्च कर रही है जिसका फायदा कम नुकसान ज्यादा नजर आ रहा है। इस खेल की आड़ में दिल्ली सरकार बहुत से मुददे भुनाना चाहती है, जंैसे- दिल्ली में हजारों बेेघरों के लिए सामाजिक सुरक्षा का कोंई इंतजाम नहीं है, रोजगार के अभाव में गांव से पलायन करके षहर आये हुए असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के जीवन की मूलभूत सुविधाओं और झुग्गी बस्तीयों में रहने वाले लाखों लोगांे के बेहतर जीवन के लिए तो सरकारी खजाना खाली हो जाता है मगर 12 दिन के खेल के लिए 30,000 करोड़ रूपये खर्च किये जा रहे है। अगर इतिहास को देखे तो एषियार्ड खेलों के लिए सरकार ने देष भर से जो मजदूर बुलाए थे उनकी मेहनत से खेलों का आयोजन तो सफल हो गया मगर उनके रोजगार व सामाजिक विकास की स्थिति बदतर हो गई है। क्योंकि सरकार का मानना है कि शहर के सौदन्र्यकरण के नाम पर मजदूर ऊंची ऊंची बिल्डिंग ंतो खड़ी करें मगर वो इसकी सुन्दरता मे खलल न बनें। सरकार को एक तरफ सस्ते मजदूर भी चाहिये और दूसरी तरफ उनके प्रति कोई सामाजिक व नैतिक जिम्मेदारी लेने के लिये भी तैयार नहीं है और इसी दोहरी नीति के चलते शहर को सुन्दर बनाने और सजाने वाला मजदूर शहर से अलग कच्ची काॅलोनीयांे और झुग्गी बस्तीयांे में रहने को मजबूर है, जहां पर स्वस्थ पानी, बिजली, स्वास्थ्य और षिक्षा जैसी मूलभूत जरूरतों का अभाव पाया जाता है। काॅमन वेल्थ की झुठी शान में सड़कों को चैड़ा करने के बहाने रेहड़ी-पटरी रिक्षा-ठेला और सड़कों के किनारे रोजी रोटी चलाने वाले लोगों को हटा रही है ओर उनके लिये कोई अन्य व्यवस्था भी नहीं की जा रही है। खेल के इसी लपेटे में राजीव रत्न आवास योजना के तहत 44 झुग्गी बस्तीयों को हटाने का भी फरमान है लेकिन मजेदार बात यह है कि इन 44 बस्तीयों को 7900 फ्लेटों में षिफ्ट किया जायेगा। इस फ्लैट आवंटन के नाम पर लाखों लोगों को उजाड़ा जायेगा।
काॅमन वेल्थ खेल का खर्चा 10000 से बढ़कर 30000 करोड़ तो हो गया है लेकिन यह कहना मुष्किल है कि इस पैसे काम चल जायेगा। अब सवाल उठता है कि कौन काॅमन है और किसका वेल्थ है जिसके लिये पूरे दिल्ली शहर को दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है। चंद लांगों के इस खेल के आयोजन में, जो अंग्रेजों की गुलामी की याद को ताजा करता हो उसका सबसे ज्यादा सामाजिक आर्थिक प्रभाव दिल्ली के गरीब औरतों, बच्चों, बेघरों, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और रिक्षा-ठेला वालों पर पडे़गा। सड़कों को साफ व सुंदर करने के लिये सड़क के किनारे से सभी ठेले और छोटी दुकानों को हटाया जायेगा क्योंकि विदेषीयों को भारत की असली तस्वीर दिखाने की बजाय एक बनी बनाई छवि दिखाई जाये ताकि उन लोगों को लगे कि भारत ने अभूतपर्व प्रगति की है।
काॅमन वेल्थ के लिये दिल्ली में सैंकड़ों करोड़ रूपये लगाकर ‘खेल गांव’ का निर्माण किया जा रहा है, वहां से गरीब लोगों की बस्तीयों को उजाड़ दिया है मगर खेल के बाद यह फ्लैट अमीरों का अड्डा बनने वाले है। झारखण्ड व छतीसगढ़ जैसे प्रदेष जहां पर खेलों के लिये पर्याप्त सुविधाओं की जरूरत है वहां पर प्राथमिक सुविधाएं भी नहीं है। अभी जो स्टेडियम बन रहे हैं क्या सरकार उनका रखरखाव ठीक तरिके से कर पायेगी? चीन में ओलंपिक के आयोजन के लिये जो स्टेडियम बनाये थे उनका रखरखाव करना आर्थिक रूप से भारी बड़ रहा है जबकि चीन की खेल संस्कृति विकास का एक स्तर प्राप्त कर चुकी है। अगर इन खेल स्टेडियमों का उचित संरक्षण व उपयोग नहीं कर पाये तो करोड़ों रूपये के निवेष का कोई सार्थक उपयोग नहीं हो पायेगा और यह सीख हमें 1982 के एषियार्ड खेलों से ले लेनी चाहिये जिसमें लगाई गई मानवीय श्रम व पंूजी की ठीक से उपयोग होता तो आज काॅमन वेल्थ का बजट 30000 करोड़ तक नहीं पहुंचता।
ऐसे आयोजनों से न तो खेल का भला होने वाला और न ही आम नागरीको का बल्कि दिल्ली में रहने वाला हर आम आदमी इन 12 दिनों के खेलीय महोत्सव से प्रभावित होगा। दिल्ली विष्वविधालय और जामिया के छात्रों को अभी से छात्रावास खाली करने पड़ रहे है और इनका जो खर्चा कामन वेल्थ के नाम पर होगा उनकी कही भी कोई गिनती नहीं हो रही है। दिल्ली का हर आम नागरिक कामन जरूर है मगर वेल्थ में उसका कोई हिस्सा नहीं है।

शनिवार, 3 जुलाई 2010

ठेंगा दिखाती बड़ी सिंचाई परियोजनाएं



बंाध और विस्थापन दोनों त्रासदी व पर्यावरणीय कारणों के चलते चर्चा में रहें हैं। एक तरफ बांध बनाने के नाम पर गांव के गांव विस्थापित किये गये तो दूसरी तरफ देष में बांधों से होने वाले विकास का विषेष प्रभाव नजर नहीं आता है। देष मे बड़ी-बड़ी सिंचाई परियोजना के नाम पर करोड़ों रूपयों का बजट पानी की तरह बहाया जाता है जिनका उदे्ष्य कृषि को उन्नत बनाना है लेकिन इन परियोजनाओं की सिंचाई का लाभ देष की कृषि को नहीं मिल पाया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देष मंे नहरों से सिंचित क्षेत्रफल घटता जा रहा है जो 1991-92 में 178 लाख हेक्टेयर भूमि था वो ही 2003-04 में 146 लाख हेक्टेयर भूमि रह गया है यानी 14 वर्षोंे के दौरान नहरों से होने वाले सिंचाई के क्षेत्रफल मे 32 लाख हेक्टेयर की कमी आयी है। विष्व बैंक ने 2005 में अपनी रिर्पोट में कहा है कि भारत में सिचाई परियोजनाओं (जो दुनियां की सबसे बड़ी है) के ढ़ाचागत विकास के रखरखाव के लिये 17 हजार करोड़ सालाना की जरूरत है मगर बजट 10 प्रतिषत से भी कम उपलब्ध होने के कारण यह परियोजनाएं कृषि के विकास में सहायक नहीं बन पाती है।
2007 तक बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं पर 130,000 करोड़ रूपये खर्च किये गये। बड़े बांधों से सिंचित क्षेत्रफल नहीं बढ़ा जबकि इस अवधी के दौरान कुल सिंचित क्षेत्र में वृद्धि हुई है जिसके कारण कुएं, तालाब व सिंचाई के छोटे साधन है। बढ़ती हुई आबादी व सीमित संसाधनों के कारण न केवल सिंचाई के लिये अपितु पीने के लिये भी पानी एक गम्भीर समस्या बना हुआ है, ऐसी स्थिति में कृषि उत्पादन बढ़ाने और पीने के पानी की समस्या का समाधान करने के लिये दोनों में संतुलन बनाना जरूरी है।
11 वीं पंचवर्षीय योजना सहित तमाम पंचवर्षीय योजनाओं में जल संसाधन विकास के पूरे बजट का लगभग दो तिहाई बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के लिये उपयोग किया गया है। देष की बड़ी नदीयों की सफाई के लिये तो सैंकड़ों करोड़ों रूपयों की परियोजनाएं मंजूर हो जाती है और पानी के कुषल उपयोग के लिये अब तक कोई विषेष परियोजना और नीति सामने नहीं आयी है।
बड़ी सिंचाई परियोजनाओं की असफलता के पीछे कुछ कारण जरूर है, जैसे जलाषयों व नहरों में गाद जमा होना, सिचाई अधोसरंचना के रख-रखाव का के साधनों का अभाव, नहरों के शुरूआती इलाकों में ज्यादा खपत वाली फसलें लेना, पानी को गैर सिंचाई के कार्यों के लिये मोड़ना और भू-जल दोहन का बढ़ना। लेकिन मुख्य कारण है कि भौगालिक स्थिति और उपलब्ध संसाधनों को देखते हुए इन योजनाओं का ढ़ाचा तैयार नहीं किया जाता है।
कई योजनाओं में बांध तो बन गये है मगर नहरें बनाने के लिये सरकार के पास बजट नहीं है, इस कारण बहुत सी परियोजनाएं ढ़प पड़ी है और उसका नुकसान किसानों को उठाना पड़ रहा है। योजना आयोग के आंकड़े बताते हैं कि बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के प्रति हेक्टर लागत छोटी परियोजनाओं की तुलना में 10 गुना ज्यादा है। उदाहरण के लिये राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर से सिंचित क्षेत्रफल को लगातार बढ़ाया गया मगर पर्याप्त पानी नहीं मिलने के कारण फसलें चैपट हो गई और किसान आंदोलन करने पर उतर आये। ऐसी अनेक बड़ी सिंचाई परियोजनाएं हैं जो राज्यों के आपसी विवादों के कारण बंद पड़ी है और किसानों को पानी नहीं मिल रहा है। नहर में जो गाद जमा हो जाती है अथवा माइनर के उपर टीला बन जाता है तो किसान को अपने साधन व श्रम लगाकर साफ करना पड़ता है, नहर विभाग भ्रष्टाचारियों का अड्डा बन चुका है, रिष्वत लेकर अमीर किसानों को नहर पर बुस्टर लगाने की इजाजत दे दी जाती है इस कारण नहर के अंतिम छोर पर स्थित जमीन एक प्रकार से असिंचित भूमि की श्रेणी में ही आ जाती है। नहरों के कारण पहले तो किसानों की जमीनों को छिना जाता है और फिर उस पानी को सिंचाई के बदले कारखानों की तरफ झोंक दिया जाता है जबकि सिंचाई के छोटे छोटे साधनों से सिंचाई करने से एक तो लागत कम आती है और दूसरा समय पर सिंचाई भी हो जाती है।
ऐसा लगता है कि भारतीय राजनेता, प्रषासनिक अधिकारी, इंजिनीयर और ठेकेदारों का एक बड़ा समूह है जो विपरीत अनुभवों और प्रमाणों के बावजूदभी बड़े बांधों और बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के लिये अरबों रूपयों का बजट स्वीकृत करवाने में कामयाब रहता है क्योंकि इनसे करोड़ों रूपयों की दलाली करने का मौका मिलता है।
यहां पर दो बातें स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है कि देष में हर साल बड़ी सिंचाई परियोजनाओं पर होने वाले हजारों करोड़ रूपयों से शुद्ध सिंचित क्षेत्र में कोई वृद्धि नहीं हो रही है और दूसरी बात है कि शुद्ध सिंचित क्षेत्र में वास्तविक वृद्धि भू-जल से हो रही है और भू-जल ही सिंचित खेती की संजीवनी है। अगर गलत प्राथमिकताओं से निकलकर बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं पर पैसा र्खच करने की बजाय मौजूदा अधोसंरचनाओं की मरम्मत व विकास, जलाषयों में गाद कम करने के उपाय, वर्षा जल के संरक्षण व संचयन को प्रोत्साहन देना बेहतर है जिससे पीने के पानी और सिंचाई के पानी दोनों में समंवय बनाकर देष को पानी के भीषण संकट से उभारा जा सकता है।

(दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण के 3 जुलाई 2010 के अंक में प्रकाशित.)

बुधवार, 30 जून 2010

क्रांति

हरिराम: क्रांति क्या है गुरुदेव ?
गुरु: क्रांति एक चिड़िया का नाम है हरिराम.
हरिराम: वह कहाँ रहती है गुरुदेव ?
गुरु: वह चतुर लोगों कि जुबान पर और सरल लोगों के दिल में.
हरिराम: चतुर लोग उसका क्या करते है ?
गुरु: चतुर लोग उसकी प्रशंसा करते है, उसके गीत गातें है और समय आ जाने पर उसे चबा जातें है.
हरिराम: और सरल लोग उसका क्या करतें है ?
गुरु: वह उनके हाथ कभी नहीं आती.
असगर वजाहत
(उद्भावना के अगस्त 2004 के अंक में प्रकाशित )

मंगलवार, 29 जून 2010

ON KHAP PANCHAYAT AND IT’S HONOR -- Moggallan Bharati

“The love of the intellectuals Indians for the village community is of course infinite if not pathetic…What is the village but a sink of localism, a den of ignorance, narrow mindedness and communalism?”
Dr. B. R. Ambedkar, during Constitutional Assembly Debates, 1948.
That what Ambedkar said in the year 1948, and that’s what still is the state of affairs in India’s villages where "institutions" such as Khap/Caste Panchayat not only exist and flourish but are also being nurtured by the political class of our country. Dr. B. R. Ambedkar was of the firm view that the village in India forms the social unit of society which thereby requires going through a profound social change. However, the Indian society in general and its countryside in particular, as it today, never witnessed the unfolding of the process of enlightenment. The project of enlightenment in this country was a nonstarter from the day one. Hence, as the consequences we still see continuance of these caste panchayats to follow a certain "code" which is an unwritten law for them, through which they save and defend their "honour" and in the process going to the extent of murdering people for the sake of this "honour", of course with the sanction of their whole community.


What is this "honour" which these Caste Panchayats try to "save" and what is so very important in this honour that they shamelessly claim pride for? And what on earth gets them into such acts of frenzy - killing people - even young men and women in order to defend this honor? Answers to these questions are not simple and unilinear but are quite complex. In other words, in order to answer these question one has to look at at how caste, class and gender operates in rural and indeed in many parts of urban India.


A Khap is a fairly old system of social administration in the villages of Northwestern India covering Rajasthan, Punjab, Madhya Pradesh, Haryana, NCR, and parts of Western Uttar Pradesh. A unit of khap takes care of the social affairs of almost 84 villages from the same caste. It has also been mentioned in some news reports that Khaps Panchayat plays an important role in regulating the society, for example in some instances Khaps have been able to prohibit consumption of liquor. They help in regulating the society in a ‘certain’ way which keeps the traditions intact and thus helps in strengthening the ‘bhaichara’ (brotherhood) among the community. Having said that, lets see what Khaps really are and why do they still exist, in these times of atleast formal democracy in India. Khap Panchayats are the self proclaimed arrangement of caste lords in a village and enjoy full legitimacy and authority among the sections of their caste - community. Among their briefs - the most primal of which is the custodianship of "honour", is to order brutal maiming, lynching or even killing couples who marry either in the same gotra (there can be numerous gotras within a caste) or who "indulge" in inter caste marriage. While in the former, that is marrying in same gotra, the "logic" purported is that the couple are in fact "brother and sisters" (of the same gotra) and therefore their marrying each other is an assault on their honour (in some cases of this kind, the wife was forced to tie Rakhi on her husband - a simple way to declare a married couple- brother and sister). In the latter kind of honour breach, the punishment is generally simply that of death. The breach of honour is of more serious kind here. The only thing which is left for the Khaps here is, is to discuss the ways to deliver this death to the transgressor.


It is this latter sphere - the absence of sanction to inter-caste marriage - which forms the bed rock of our village society and in its final analysis gives the material conditions for the ‘institution’ like caste/khap Panchayat to survive. It is here in this sphere of contentious /inter-caste marriages that we witnessed the various archaic social factors working behind these caste panchayats. In other words, the caste panchayats are the logical outcome of the caste relations in rural society which derives its authority from defending the honor of a caste group which in turn necessitates the cohesiveness of the same.


Before we further delve upon this issue let’s see what is this whole concept of "honour". Honour or for the Hindi speaking people, izzat is the central reason for the functioning of these caste panchayats. In the popular perception of rural society and as well as in the Hindu scriptures, women are the repositories of this izzat of a community. The greatest danger to this ideology of izzat comes from the woman. In the warped logic of the caste system that dictates terms of life in villages, a female "dishonours" her family/clan/ caste and community by her "shameful conduct". Why is their conduct termed "shameful"? To understand this we should see what Manu, the Law Giver of the codified Hindu caste system writes for women in Manusmriti: (translated)


• II. 213. It is the nature of women to seduce man in this (world). For that reason the wise are never unguarded in (the company of) females.
• IX. 14. Women do not care for beauty, nor is their attention fixed on age; (thinking), (It is enough that) he is a man, they give themselves to the handsome and to the ugly.
• IX. 16. Knowing their disposition, which the Lord of creatures laid in them at the creation to be such, (every) man, should most strenuously exert himself to guard them.
• IX. 17. (When creating them) Manu allotted to women (a love of their) seat and (of) ornament, impure desires, wrath, dishonesty, malice and bad conduct


It is clearly and further stressed in Manusmriti that women should not be made free under any circumstances:

• IX. 2. Day and night women must be kept in dependence by the males (of) their (families), and if they attach themselves to sensual enjoyments, they must be kept under one’s control.
• IX. 3. Her father protects (her) in childhood, her husband protects (her) in youth, and her sons protect (her) in old age; a woman is never for independence.
• IX. 5. Women must particularly be guarded against evil inclinations, however trifling (they may appear); if they are not guarded, they will bring sorrow on two families.


These above verses coupled with other Codes (which must not be seen in their textual isolation) to be observed for caste purity describes the way caste panchayats operates in rural society. It is these archaic laws ingrained in the minds and actions of rural folks which drive them to uphold their caste linkages and force them to have a closer surveillance on the happening marital alliances. Thus, it is the woman who holds the key to the honour of a caste group and it is by not letting the woman to marry beyond the fold of her own caste (in various instances in the same gotra) that these caste panchayats maintain strict endogamy and thus the honour of their caste group and the "purity" of caste itself.


Now, the crucial thing is to understand what hold this archaic set of laws together with set of modern and formal institutions like Panchayati Raj, Judiciary, Police and the larger State. In India the institution of Panchayati Raj or the third tier of the government was introduced with lots of hopes in order to further decentralise the governing process. The larger objective was to give the power to the last person and make him/ her participate in the governing process. In many states this institution is quite vibrant and the enthusiasm of the people from lower rungs has been visible and effective. This decentralization of the government at the grass root level, if not entirely, has certainly brought the partial democratization in village society. But despite this drive of democratization in Villages of India, there are certain questions which really perplex one such as, why is the case that the elected panchayats had a very limited or no role to play in the matters of governance that are otherwise usurped by Khap Panchayats? What is the role of State’s law- enforcing agency in such matters that the Khap Panchayats usurp for themselves and indulge in kangaroo courts dispensing (in)justice? Why is there no movement or even noise by the political parties (with an obvious exception of the Left, particularly the CPI(M) taking up this issue) on the brutal violence perpetrated by the dictates of Khaps? Answer to such questions needs closer study of caste society and its relation with the day-to-day politics in the modern Indian state.


It can be stated that Khaps are the classic example of patron - clientele nature of Indian politics, where these panchayats have been given political patronage and thus have become immune to constitutional framework of law and order. In Haryana, for example, khaps are the crucial channels to galvanise caste based political mobilisation which becomes so very central to the functioning of every political party, that instead of questioning the very existence of khaps, the Khaps controls the lever of political stability. However, there is some resistance to khaps as well, though in minimalist sense but the resistance is growing. The role of increasing democratisation and opening of new economic opportunities has brought a gradual shift in the power dynamics (an example of this can be seen in rural Haryana) between different caste groups. The rising assertiveness of Dalits – owing to their socio-political movement as well as sections of them coming up as confident, modern individuals – is inevitably leading up to various cases of inter caste marriages and ultimately stiff and violent resistance on the parts of caste panchayats. This section of young people are consistently challenging the idea of such archaic laws and eventually questioning the whole edifice of caste panchayats by defying and discarding the dubious notions of "honour".


To sum it up, two broader propositions can be made for as to why these Khaps still been able to call shots in rural north-western India: Firstly, Caste panchayats are the logical outcome of caste and gender relations in Indian society which in turn is the result of unfinished enlightenment project (primarily movements against Caste and atrocities against women) whereby these panchayats enjoys not merely political support but also drives the local politics. And secondly, the patronization of khaps by the political parties is in turn the result of the hegemonisation of caste relations over the polity, where by the political actors themselves firmly believes and support institution like Khaps and its action too. Thus, it’s a vicious circle of caste relations, polity, and the absence of anti caste movements in the first place which gives life to khap panchayats and proves to us that without the actualization of broader social change monsters like Khaps will not only smile on the face of ‘emerging’ India but will thrive and be defended by the gatekeepers of Indian Polity.

( Writer is research scholar in J.N.U.

रविवार, 27 जून 2010

भूमाफियाओं का जाल

तीव्र गति में बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण जमीन को लेकर पूरे देष में मारा मारी चल रही हैै। रोजगार के अवसरों की कमी, खेती की पैदावार में गिरावट और प्राकृतिक प्रकोपों की वजह से लगातार गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ रहा है। इन पलायन करने वालों में मजदूर से लेकर छोटे व्यापारी और षिक्षित युवा वर्ग भी शामिल है। शहरों में सीमित संसाधनों की वजह से रहने के लिये जमीन का अभाव हो रहा है, ऐसी स्थिति में छोटे से लेकर बडे शहरों तक भूमाफियाओं के जाल बिछे हुए है जो अवैध रूप से रोज करोड़ों की जमीन पर कब्जा करते हैं। जमीन पर कब्जा करने वाले इन भूमाफियाओं के बड़े-बड़े गिरोह है, जिनमें वो बेरोजगार युवक भी शामिल है जिनकी आमदनी का अन्य कोई साधन नहीं होता है। ये दिन भर इसी चक्कर में धुमते रहते है कि कौन सी जमीन का मालिक कहां रहता है और उसकी स्थिति कैसी है यानी उसके स्टेटस का पूरा बायोडाटा इनकी खोज का विषय होता है। इसी के तहत ये माफिया ईज्जत और शोहरत पाते है जिसे देखकर छोटे शहरों के युवा उसी रास्ते पर चलने की ठान लेते हैं। यह तो इनका प्राथमिक व्यवसाय है उसके बाद सड़क के ठेकों से लेकर राजनीति तक के ठेके इनकी बायीं जेब में पड़े रहते है। अगर इनके कब्जे करने के तरिकों को देखा जायंे तो साफ समझ में आता है कि प्रषासन का भी उसमें हाथ हैं। नकली रजीस्ट्री और किसी भी जमीन पर रात भर में मकान खड़ा कर देता बिना प्रषासनिक मिली भगत के सम्भव ही नहीं हो सकता। कानून से बचने के भी इन्होने अनोखे तरिके निकाल रखे है, बहली बात तो ये किसी को मारते नहीं केवल आम जनता में भय फैलाये रखते है और अगर कोई गलती से मर भी जाता है तो उस अपराध को किसी दूसरे के सर पर डाल देते, जो लोग वो पहले से ही तैयार रखते है। बड़े-बडे़ भूमाफियाओं के तार राजनीतिक रूप से भी मजबूत होते है क्योंकि ये नेताओ की कमाई के साधन भी है और जनता में भंयकर रूप से भय बनाये रखते है जिनका राजनीतिक फायदा भी उठाया जाता है, इस तमाम उठापटकों में नुकसान जनता को ही मिलता है। राजनीति में पकड़ होने की वजह से सरकारी जमीन पर भी बड़े पैमाने पर कब्जा हो रहा है, धर्म के नाम पर भी सैंकडों एकड़ जमीन पर तथाकथित बाबों द्वारा कब्जा करना जारी है, इस खेल में सरकारी अधिकारीयों से लेकर राजनेताओं तक की सांझेदारी होती है। पुलिस भूमाफिया गठजोड़ तो इतना मजबूत है कि जिले में आने वाला हर अधिकारी इनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध रखता है, जब इस गठजोड़ के बीच आपस में खिंचातानी हो जाती है तब जाकर कहीं मामला सामने आता है। हर जिले से लेकर पूरे देष में भूमाफियाओं का जाल इतना फैला हुआ है कि रोज ऐसी घटनाए सामने आ रही है मगर सरकारें फिर भी चुप है, इनके खिलाफ कानून बनाकर सजा देने के बजाय शह दीये जा रही है, अवैध धंधों से आने वाले काले धन का कोई हिसाब न तो आयकर विभाग के पास है और न ही पुलिस प्रषासन के पास। कानूनी प्रक्रिया के जटिल और खर्चीली होेने के कारण आम इंसान इस जुल्म को सहता रहता है। धन बल के आधार पर ये माफिया फिर राजनीति में आ जाते, जनता को डर दिखा कर वोट ले लेते है फिर तो पूरे पांच साल लूटने का लाइसेंस ही मिल जाता है। अगर इस बात की जांच हो कि देष के सता के गलियारों में बैठे हुये लोगों में से कितने माफिया है या माफियों से उनके तार जुड़े हुए है, तब गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे। आजकल इन भूमाफियाओं का निषाना जंगल और बंजर पड़ी हुई जमीन है, जंगलों पर लगातार हमले करके वहो रहने वाले आदवासीयों का जीना दुभर कर दिया है। इनके अलग अलग गुट होतें जिनका अलग अलग राजनीतिक दलों से तालुक होते है, इसी कारण कभी कभी इन गुटों के मध्य लड़ाई झगड़े भी सामने आते है जिससे एक विषेष प्रकार का भय व्याप्त माहौल बन जाता है और इन्हीं झगड़ों का बखान लम्बे समय तक करके अपनी गेंग बनाये रखते है। फिर खुद की छवी को राजनीति के सांचे में फिट करने के लिये ये समाज सेवा का ढ़ोंग रचते है क्योकि इससे एक तो आसानी से काले धन को सफदे मुद्रा में बदला जा सकता है और चुनाव जीतने में भी आसानी रहती है। ऐसे लोगों से जन सेवा की आषा नहींे करना चाहिए। अगर हमें देष के लोकतंत्र को बचाना है तो ऐसे लोगों को राजनीति में आने से रोकना होगा, चाहे वो किसी भी दल या विचाराधारा के क्यों न हो।

रविवार, 20 जून 2010

गुरु चेला संवाद-2

गुरु-- "चेला, हिन्दू-मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते।"
चेला-- "क्यों गुरुदेव?"
गुरु-- "दोनों में बड़ा अन्तर है।"
चेला-- "क्या अन्तर है?"
गुरु-- "उनकी भाषा अलग है...हमारी अलग है।"
चेला-- "क्या हिन्दी, कश्मीरी, सिन्धी, गुजराती, मराठी, मलयालम, तमिल, तेलुगु, उड़िया, बंगाली आदि भाषाएँ मुसलमान नहीं बोलते...वे सिर्फ़ उर्दू बोलते हैं?"
गुरु-- "नहीं...नहीं, भाषा का अन्तर नहीं है...धर्म का अन्तर है।"
चेला-- "मतलब दो अलग-अलग धर्मों के मानने वाले एक देश में नहीं रह सकते?"
गुरु-- "हाँ...भारतवर्ष केवल हिन्दुओं का देश है।"
चेला-- "तब तो सिखों, ईसाइयों, जैनियों, बौद्धों, पारसियों, यहूदियों को इस देश से निकाल देना चाहिए।"
गुरु-- "हाँ, निकाल देना चाहिए।"
चेला-- "तब इस देश में कौन बचेगा?"
गुरु-- "केवल हिन्दू बचेंगे...और प्रेम से रहेंगे।"
चेला-- "उसी तरह जैसे पाकिस्तान में सिर्फ़ मुसलमान बचे हैं और प्रेम से रहते हैं?"
असग़र वजाहत

गुरुवार, 17 जून 2010

अनकहा सच

हमारे समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि जो सच है वो कह नहीं पातें है और जो कहते है वो सच नहीं है. नहीं कह पाने और जो कहते है उसके बिच में इतना बड़ा फासला है कि उसको समझने के लिए उन तत्वों को समझना जरूरी है जो सच पर पर्दा डाल देते है. असल में हमारे समाज में बहुत बड़ा विरोधाभाष है कि हमें नेता तो चाहिए टाई बांधने वाला और बड़ी बड़ी गाड़ियों में चलने वाला मगर हम उससे यह भी आशा करते है कि वो गरीबो और समाज के पिछड़े लोगों के बीच में आकर उनकी समस्याओं को सुने और समाधान निकाले. यह कैसे संभव है? क्यूंकि न ही तो जनता उससे खुद को जोड़ पायेगी और न ही वो नेता उनकी समस्याओं को समझ पायेगा. लोकतंत्र में इसका तीसरा विकल्प भी तलाशा गया और उस तीसरे विकल्प में है कि एक ऐसा वर्ग तैयार किया गया है जो भाषा तो नेता और जनता दोनों कि समझाता है मगर उसका चेहरा दोनों से ही मेल नहीं खता है. बिना जनता कि बहुमत के वो सता के तमाम सुख भी भोगता है और बिना एक कांटा निकाले जनता का सेवक भी बन जाता है. आप इसे दलाल भी कह सकते है . सडकों से लेकर संसद तक तमाम ठेके इसके नाम पर ही अलोट होते है और आप यह भी जानते होंगे कि देश के तमाम काम आजकल ठेकों पर चल रहे है. यह ठेकेदार विभिन्न रूप में हमारे समाज में मौजूद है , अमेरिका से लेकर नारनोल तक इसके चेले छपते लोग बैठे हुए है . हम सब इन दलालों को जानते है और चुप भी है. घर बैठ कर आराम से तमाम राजनैतिक (जिनकी कोई नैतिकता नहीं है) पार्टियों को गली भी देते रहते है और चुनाव के समय आँख बंद कर ठपा( आजकल बटन) भी लगा देतें है. कैसा समय है और कैसे कैसे लोग है कि चारों और शोर है फिर भी एक छुपी सी लगती है.